कुछ लोग कागज पर ही नहीं, जीवन में भी बहुत बड़े होते हैं। यह लाइन साहित्यकार यश मालवीय ने दो दिन पहले जवान बेटे को खोने के बाद मरीजों को निशुल्क देखने के लिए अपने क्लीनिक में बैठे प्रख्यात होम्योपैथ चिकित्सक डॉ. एसएम सिंह के लिए कही।
22 अगस्त की सुबह डॉ. एसएम सिंह के छोटे बेटे डॉ. राहुल सिंह का निधन हो गया था। जवान बेटे को खोने के बाद भी डॉ. एसएम सिंह अपने कर्तव्य को नहीं भूले। लगातार 35 वर्षों से वह प्रत्येक रविवार को गीता निकेतन के पास स्थित अपने आवास पर दूरदराज से आने वाले मरीजों को निशुल्क देखते हैं।
इस दौरान पत्नी के साथ उधर से गुजर रहे साहित्यकार यश मालवीय ने देखा कि डॉ. एसएम सिंह के आवास पर स्थित क्लीनिक में लोगाें की भीड़ लगी है। पहले तो उन्हें लगा कि अभी बेटे को खोया है, कैसे क्लीनिक में बैठेंगे। जब वह डॉ. एसएम सिंह से मिले तो वह अपनी आंखों में आंसू लिए मरीजों को देख रहे थे।
इस दौरान उन्होंने कहा कि मेरा बेटा राहुल हमेशा गरीब व असहाय लोगों की मदद के लिए खड़ा रहता था। परसों तक वह कंधे से कंधा मिलाकर साथ था। उसकी आत्मा की शांति के लिए मैं कलेजे पर पत्थर रखकर यहां बैठा हूं और अपने व उसके चिकित्सकीय धर्म का निर्वाह कर रहा हूं। यश मालवीय कहते हैं कि मैं भी उनको डबडबाई आंखों से देखता रहा और निशब्द भाव से बस उन्हें प्रणाम करके लौट आया।