बकरों की खरीदारी पर इस बार महंगाई की मार
बकरा खरीदने आए हटिया निवासी मो. मुस्तफा ने बताया कि हटिया में पहले चांद दिखने के बाद से बकरीद तक नौ दिन 4,000 से 5,000 बकरे बिक जाया करते थे। इस बार महंगाई की वजह से 150 से 200 बकरे ही बिके। इसका मुख्य कारण बकरा मंडी का अस्करी मोड़ रोड करेली शिफ्ट हो जाना भी है। राजस्थानी और कुछ खास नस्लों के बकरों को पत्ता, मेवा और फल खिलाया जाता रहा। इन मंडियों में बाहर से भी किसान पशुओं को बेचने आ रहे हैं। कौशाम्बी, फतेहपुर, प्रतापगढ़, चित्रकूट, शक्तिनगर और मध्यप्रदेश के सीधी, सतना के पशुपालक से भी बकरे लेकर पहुंचे।
छह लाख के पठान के साथ सोनू मियां।
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राजस्थानी बकरों ने मंडी में जमाया कब्जा, देसी बकरों की मांग घटी
अटाला में अकोढ़ा, करछना से आए व्यापारी शकील अहमद और अकबर अली ने बताया कि राजस्थानी बकरे बाजार में आने से देसी बकरे कम और सस्ते दामों में बिक रहे हैं। उनके बकरे 18,000 से 20,000 रुपये में बिके। वहीं, प्रतापगढ़ से आए व्यापारी नूर आलम ने बताया कि उनके पास 10,000 से 12,000 रुपये तक बकरों की बोली लगी। बकरा खरीदने आईं करेली निवासी माजदा बेगम ने बताया कि पिछले साल की तुलना में इस बार बकरे महंगे हैं। जो पिछले साल 4,000 रुपये के थे वो इस बार 6,000 रुपये में मिल रहे हैं।
असाड़ा, कौशाम्बी के पशुपालक हसीन अहमद पिछले एक महीने से बकरा बेच रहे हैं। उन्होंने 18,000 से 22,000 रुपये के 17 देसी बकरे अब तक बेचे। उन्होंने बताया कि शिया समुदाय के लोग पाठा नस्ल के बकरे की कुर्बानी देते हैं। वहीं सुन्नी समुदाय के लोग खस्सी या बधिया बकरे की कुर्बानी देते हैं। इसके अलावा लोग भेंड़ और भैंस की भी कुर्बानी देते हैं। सरायअकिल कौशाम्बी से करेली आए बकरा व्यापारी दीपू ने बताया कि उनके पास 44 देसी नस्ल के बकरे थे। इनमें 40 बकरे 18,000 से 20,000 रुपये बेच चुके हैं।