जापान को हिन्दी के संस्कार से जोड़ने वाले डॉ.लक्ष्मीधर मालवीय के आंखें मूंदने के साथ ही इलाहाबाद की एक और शख्सियत अतीत हो गई। वह अंतिम समय तक पूरी जीवंतता से रहे लेकिन हाइपोग्लाइसिमिया की वजह से अचानक नींद में ही ‘सोते’ रह गए। लगभग 54 वर्ष जापान में गुजारने के बावजूद वह भीतर से पूरी तरह भारतीय थे। हालांकि यहां की भीड़भाड़ और देश-समाज की स्थितियों से बहुत आहत थे। ‘असत्यमेय जयते’ के तहत उन्होंने मौजूदा समय का सच लिखा था।
‘अमर उजाला’ से बातचीत में डॉ.मालवीय की बड़ी बेटी मधु सक्सेना ने उनसे जु़ड़ीं स्मृतियां साझा कीं। बोलीं, उनके भीतर जापान को कुछ भी अंश नहीं था। उनकी सांसें यहीं इलाहाबाद में बसती थीं। वह घर लहलहाता था इतने बरस के बाद भी घर के इर्द-गिर्द के मकान, दुकान, सड़क, यहां तक नालियां सबके बारे में लगातार पूछते रहते। आज का कॉफी हाउस उनकी कल्पना से परे था। उनकी मातृभाषा अवधी थी और हम घर में आपस में अवधी में ही बातचीत करते थे। उनमें भाषा का संस्कार ऐसा था कि अवधी का एक शब्द भी गलत निकल जाए तो फौरन टोकते, दुरुस्त करते थे। हिन्दी के साथ ही संस्कृत, अंग्रेजी, जापानी का उन्हें जबर्दस्त ज्ञान था।
बकौल मधु, उनका जीवंत व्यक्तित्व था या कह सकते हैं कि वह ‘युवा वृद्ध’ थे। मौलिक काम, विशेषकर शोध के प्रति उनकी ऐसी लगन थी कि साठ वर्ष में नौकरी को अलविदा कहने के बाद वह शोध और अध्ययन में जुट गए। उनके अनेक विद्यार्थी कुलपति होकर रिटायर हुए। वह बहुत अच्छी पेंटिंग भी बनाते थे। हिन्दी का शायद ही कोई ऐसा यशस्वी साहित्यकार रहा हो, जिसकी छवियों को उन्होंने न उकेरा हो। ज्यादा काम करने के लिए डॉक्टरों के मना करने के बावजूद वह अपने कंप्यूटर पर लगातार अठारह-अठारह घंटे काम करते थे। किसी विद्यार्थी की तरह पूरी प्रतिबद्धता से कंप्यूटर से नाता जोड़कर उनका लिखने-पढ़ने का सिलसिला अंत तक बना रहा।