यह बात किसी से छिपी नहीं है कि निजी संस्थानों में पैसे देकर आसानी से प्रवेश लिया जा सकता है। ऐसे संस्थानों से इंजीनियरों की फौज खड़ी कर दी है, जिनके पास डिग्री तो है, लेकिन तकनीकी कौशल नहीं। इन परिस्थितियों में शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा। स्विट्जरलैंड की ही बात करें तो वहां तकनीकी रूप से दक्ष व्यक्ति को सबसे काबिल माना जाता है, लेकिन भारत में कोई छात्र आईटीआई में तभी प्रवेश लेता है, जब उसे कहीं दाखिला नहीं मिलता।
जहां तक नई शिक्षा नीति का मामला हो तो यह अच्छी बात है कि इसमें में भारतीय संस्कृति का समावेश किया गया है और इसे रोजगार परक बनाने का प्रयास किया गया है, लेकिन यह प्रयास तभी सफल होगा, जब इसे व्यापार का जरिया न बनाया जाए। पड़ोसी देश चीन का उदाहरण लें, जहां हर साल सरकार अपने खर्च पर तकरीबन 30 हजार छात्रों को विदेश में पीएचडी करने भेजती है और पीएचडी पूरी करने के बाद छात्र अपने देश में लौटकर काम करते हैं।
सम्मेलन में 500 प्रतिभागी हुए शामिल
इविवि के विधि संकाय में ‘मानवाधिकार: अतीत, वर्तमान एवं भविष्य’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन का रविवार को समापन हुआ। इसमें 500 से अधिक प्रतिभागी शामिल हुए। मुख्य अतिथि महात्मा गांधी काशी विद्या पीठ, वारणसी के कुलपति प्रो. कैलाश नारायण तिवारी मानवाधिकारों की आवश्यकता का महत्व बताया। प्रो. अवधेश कुमार, प्रो. सुधा मिश्रा, प्रो. उमाकांत यादव, प्रो. कमलेश तिवारी, डॉ. राजेश कुमार गर्ग आदि ने विभिन्न तकनीकी सत्रों की अध्यक्षता की। स्वागत प्रो. जेएस सिंह, संचालन डॉ. सोनल शंकर, डॉ. ऋतु रघुवंशी एवं डॉ. अंजालिका और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. आरके चौबे ने किया। इस मौके पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएश के उपाध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता सैयद इम्तियाज अली आदि मौजूद रहे।