prayagraj news : fireworks
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इतिहासकारों के मुताबिक ईसा पूर्व रचित कौटिल्य के अर्थशास्त्र में एक ऐसे चूर्ण का जरूर विवरण है, जोकि तेजी से जलता था। लेकिन बारूद की बात की जाए तो इसका आविष्कार चीन में हुआ था। पटाखों का पहला प्रमाण वर्ष 1040 में मिलता है, जब चीनियों ने तीन रसायनों को मिलाकर कागज़ में लपेट कर ‘फायर पिल’ बनाई थी, वहीं यूरोप में पटाखों का चलन सबसे पहले वर्ष 1258 में हुआ था।
यहां सबसे पहले पटाखों का उत्पादन इटली ने किया था। पश्चिमी देशों ने बम बनाए, बंदूकें और तोप भी बनीं। जब बाबर ने वर्ष 1526 में भारत पर आक्रमण किया, तो वह बारूदी तोपें लेकर आया था। बाद में अकबर के शासनकाल में आतिशबाजी का प्रचलन अस्तित्व में आया। अंग्रेजी हुकूमत में महाराजा चार्ल्स पंचम अपनी सभी जीत का जश्न आतिशबाज़ी करके मनाते थे। पहले राजा, धनाढ्य ही आतिशबाजी के शौकीन थे, बाद में आम जनता में भी पटाखे फोड़ने का चलन शुरू हुआ।
अप्रैल 1667 में लगी थी पटाखों पर रोक
पहली बार 8 अप्रैल, 1667 को औरंगजेब के आदेश पर पटाखों के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई थी। बीकानेर के पूर्व राजा महाराजा गंगा सिंह ने इसका समर्थन करते हुए एक्ट का मसौदा तैयार किया, जिसमें उत्सव के लिए पटाखे का इस्तेमाल न करने को कहा गया था।
शिवकाशी में बनती है आतिशबाजी
तमिलनाडु में स्थित शिवकाशी ऐसा शहर है, जोकि पटाखों के शहर के नाम से जाना जाता है। इसे यह दर्जा दिलाने का श्रेय पी अय्या नादर और उनके भाई शनमुगा नादर को है। दोनों भाई वर्ष 1923 में दियासलाई बनाने की विधि सीखने के लिए कोलकाता गये थे। वहां से लौटकर उन्होंने आतिशबाजी बनाने की भी शुरुआत की। आंकड़ों के अनुसार शिवकाशी में तकरीबन 8,000 बड़े और छोटे कारखाने हैं, जिनमें देश के कुल 90 प्रतिशत पटाखों का उत्पादन होता है।