नाम व वल्दियत संग पता भी था दर्ज
सूत्रों का कहना है कि राजरूपपुर चौकी के तत्कालीन प्रभारी चंद्रभानु की ओर से लिखाए गए इस मुकदमे में न सिर्फ आरोपी का नाम था। बल्कि उसके पिता के नाम के साथ ही वर्तमान के अलावा स्थायी पता भी दर्ज था। वर्तमान पता राजरूपपुर जबकि स्थायी पता हटवा, पूरामुफ्ती लिखाया गया था। इसके बावजूद विवेचक उसका पता कैसे नहीं लगा पाए, यह बड़ा सवाल है।
निगरानी करने वालों की क्यों बंद रहीं आंखें
इस प्रकरण में विवेचक की भूमिका संदिग्ध है, तो पर्यवेक्षण करने वाले अधिकारियों पर भी सवाल है। आखिर उन्होंने इस संबंध में विवेचक से पूछताछ क्यों नहीं की। या विवेचना में गड़बड़ी मिलने पर इसे सुधार के लिए वापस क्यों नहीं भेजा। जानकारों का कहना है कि निष्पक्ष व पारदर्शी तरीके से जांच हो तो सच्चाई सामने आ सकती है।
प्रशासनिक आधार पर हो चुका है ट्रांसफर
इस मामले में जिस विवेचक इंस्पेक्टर वजीउल्लाह खान ने सद्दाम को क्लीन चिट दी, उसका प्रशासनिक आधार पर ट्रांसफर हो चुका है। उमेश पाल हत्याकांड के बाद जिले से एक दर्जन से ज्यादा पुलिसकर्मियों का प्रशासनिक आधार पर ट्रांसफर हुआ, उनमें वजीउल्लाह का नाम भी शामिल था। चर्चा रही थी कि अतीक गिरोह से साठगांठ की शिकायत मिलने पर गोपनीय जांच कराई गई। शिकायत सही मिलने पर ही इनका ट्रांसफर किया गया। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो सकी। हालांकि सवाल अन्य विवेचकों की कार्यप्रणाली को लेकर भी उठ रहे हैं।