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Dala Chhath : लोक आस्था का महापर्व छठ नहाय-खाय के साथ शुरू, दूसरे दिन श्रद्धालुओं ने किया खरना

Sun, 26 Oct 2025 03:31 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

पवित्रता, अनुशासन और आस्था का प्रतीक चार दिवसीय छठ पूजा महापर्व शनिवार को नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया। व्रतियों ने स्नान कर सूर्य देव की पूजा की और सात्विक भोजन किया। इसके बाद शाम को संगम नोज और बलुआ घाट सहित कई अन्य घाटों पर पहुंचकर बेदी बनाकर उस पर फूल-माला चढ़ाया।
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संगम तट पर वेदी बनातीं व्रती महिलाएं। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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पवित्रता, अनुशासन और आस्था का प्रतीक चार दिवसीय छठ पूजा महापर्व शनिवार को नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया। व्रतियों ने स्नान कर सूर्य देव की पूजा की और सात्विक भोजन किया। इसके बाद शाम को संगम नोज और बलुआ घाट सहित कई अन्य घाटों पर पहुंचकर बेदी बनाकर उस पर फूल-माला चढ़ाया। दूसरे दिन रविवार को मिट्टी या पीतल के पात्र में खीर, रोटी और गुड़ से प्रसाद बनाकर अर्घ्य दिया।

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संगम नोज, बलुआघाट ही नहीं, बरगदघाट, दारागंज के दश्वामेध, नीवा समेत अन्य घाटों पर छठ की तैयारियां की जाती रहीं। घाटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ रही। छठ पर्व का पहला दिन और पहला चरण नाहय-खाय है। पूजा का पहला दिन नहाय-खाय अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह चरण इस बात का प्रतीक माना जाता है कि भक्त संसारिक जीवन त्याग कर अनुशासन के मार्ग पर चल पड़े हैं। इस दिन भक्त नदी में स्नान कर शरीर को शुद्ध कर कद्दू भात और चने की दाल का सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि यह भोजन तन और मन दोनों को शुद्ध करता है।

डाला छठ के मौके पर पूजन सामग्री की खरीदारी करतीं महिलाएं। - फोटो : अमर उजाला।

डाला छठ महापर्व के दूसरे दिन कोखरना कहा जाता है। श्रद्धा और पवित्रता के साथ मनाया जाता है। यह दिन छठ व्रत की सबसे अहम दिन माना जाता है। व्रती दिनभर निर्जला उपवास रखकर सायंकाल गंगा, तालाब या घर में निर्मित वेदी पर सूर्यदेव की उपासना की। शाम के समय व्रती गंगाजल से स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किया। इसके बाद मिट्टी या पीतल के पात्र में खीर, रोटी और गुड़ से प्रसाद बनाकर अर्पित किया।

इस प्रसाद को ‘खरना प्रसाद’ कहा जाता है, जिसे व्रती सूर्यदेव को अर्पित करने के बाद ग्रहण करते हैं। इसके उपरांत ही अगले दो दिन के कठिन निर्जला व्रत की शुरुआत होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, खरना का व्रत आत्मशुद्धि, संयम और भक्ति का प्रतीक है। कहा जाता है। इस दिन मन, वचन और कर्म की पवित्रता से सूर्यदेव और छठी माई की कृपा प्राप्त होती है। मंदिरों और घाटों पर दिनभर छठ गीतों की मधुर ध्वनि गूंजती रही। श्रद्धालुओं ने घरों में विशेष सफाई कर पूजा स्थलों को केले के पत्तों, दीयों और गन्ने से सजाया।

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डाला छठ के लिए दौरी और डाला की खरीदारी करतीं महिलाएं। - फोटो : अमर उजाला।
पहला दिन -शनिवार 25 अक्तूबर -नहाय-खाय

दूसरा दिन- रविवार 26 अक्तूबर- खरना- व्रती दिन भर निर्जला व्रत रहते हैं। शाम को गुड़-चावल की खीर, रोटी और केले का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
तीसरा दिन- सोमवार 27 अक्तूबर- डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर परिवार संग बेटों की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
चौथा दिन- मंगलवार 28 अक्तूबर- उगते सूर्य को अर्घ्य । सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है।

फल,ईख, फूल-माला, डाला समेत अन्य पूजन सामग्री खरीदने उमड़े लोग

छठ पर्व के लिए श्रद्धालुओं ने फल, ईख(गन्ना), फूल-माला, डाला समेत अन्य पूजन सामग्री खरीदने को बाजारों में भीड़ उमड़ी। मोहल्लों के चौराहों पर भी पर्व की पूजन सामग्री बेचने वालों ने दुुकानें लगाई थीं। लोग खरीदारी कर घाटों पर स्थान घेरने भी पहुंचे थे।

मेला प्रशासन और नगर निगम ने दलदल जमीन पर सूखी मिट्टी डलवाकर घाटों पर की आवश्यक व्यवस्थाएं

मेला प्रशासन और नगर निगम ने दलदल जमीन पर सूखी मिट्टी डलवाकर घाटों पर आवश्यक व्यवस्थाएं की हैं। तहसीलदार ऋषि मिश्रा ने बताया कि घाट पर प्रकाश, पेयजल, मोबाइल टायलेट और चेंजिंग रूम आदि की व्यवस्थाएं की गई हैं। संगम नोज पर पूर्वांचल विकास और छठ पूजा समिति और बलुआ घाट पर बाबा समाजसेवी संस्थान के पदाधिकारी और सदस्य भी छठ पूजा के लिए आने वाले लोगों की पूरी सहायता करने में जुटे हैं।
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