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मासूम के जन्म से पहले मर गई संवेदना

Tue, 20 Jun 2017 02:17 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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सूबे में स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर होने का दावा करने वाले जमीनी हकीकत से बेखबर हैं। घर में किलकारी सुनने की आस लगाए आदिवासी किसान सिर्फ इसलिए टूट गया कि उसकी प्रसव पीड़िता पत्नी को गांव में समय से इलाज नहीं मिला। मासूम के जन्म से पहले ही संवेदना का मर जाना गरीब के परिवार पर भारी पड़ गया। मृत शिशु को जन्म देकर मां गंभीर हालत में आईसीयू में भर्ती है। बेबस पिता कलेजे के टुकड़े का शव गोद में लेकर एंबुलेंस के लिए भटका, मिन्नते कीं, कोई नहीं पसीजा। फिर बेबस पिता चिलचिलाती गर्मी में नवजात का शव लेकर एसआरएन अस्पताल से आठ किलोमीटर की दूरी तय कर संगम घाट पहुंचा और अंतिम क्रिया कर फूट-फूटकर रोया। उसके गले से बस यही बोल फूटे कि गांव में इलाज मिल जाता तो बच्ची बच जाती।
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जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर खीरी इलाके के कल्याणपुर में रहने वाले आदिवासी किसान सूबे लाल की गर्भवती पत्नी रन्नो को रविवार को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। वह पत्नी को खीरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले गया। वहां दिन में ही डॉक्टर नहीं थे, वार्ड ब्वाय ने भर्ती करने से मना कर दिया। फिर वह पत्नी को यहां से 30 किलोमीटर दूर कोरांव स्वास्थ्य केंद्र ले गया। यहां भी डॉक्टर नहीं मिले। पास स्थित एक निजी अस्पताल में भी उसकी पत्नी को उपचार नहीं मिला। पत्नी की पीड़ा से परेशान सूबेलाल ने आननफानन में टेंपो वाले को मनाया और भाड़ा तय कर शहर आया। शहर में बेली अस्पताल में उसे भर्ती करने से मना कर दिया गया।

बेली से निराश होकर वह जिला महिला चिकित्सालय डफरिन पहुंचा। यहां भी मामला गंभीर देख उसे टरका दिया। डॉक्टरों की सलाह मानकर घंटों भटका सूबेलाल रात में करीब एक बजे पत्नी को लेकर एसआरएन अस्पताल पहुंचा। तब तक रन्नों की हालत गंभीर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने रन्नो को भर्ती किया और
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उपचार शुरू किया। इस बीच परीक्षण में पता चल गया कि रन्नो की कोख में पल रहा बच्चा नहीं रहा। सोमवार सुबह रन्नों का ऑपरेशन किया गया। उसने मृत बच्ची को जन्म दिया। गंभीर हालत में उसे आईसीयू में भर्ती कराया गया लेकिन उसे नहीं मालूम होने दिया गया कि उसकी कोख उजड़ चुकी है। पिता के हाथों में मृत शिशु आया तो वह रो पड़ा। उसे संगम घाट तक जाने के लिए एंबुलेंस नहीं मिली। बताया गया कि सरकारी एंबुलेंस मरीज लाने के लिए है, पहुंचाने के लिए नहीं। साफ है कि सूबे लाल की जेब खाली थी इसलिए सुनवाई नहीं हुई।

रोते बिलखते आदिवासी सूबे लाल व्यवस्था को कोसते हुए पैदल ही नवजात की अंतिम क्रिया करने निकल पड़ा। तेज धूप और चिलचिलाती गर्मी में उसने गोद में नवजात का शव लेकर आठ किलोमीटर की दूरी तय की। संगम के निकट गंगा घाट पर बेटी का परंपरा के मुताबिक प्रवाहित कर अंतिम संस्कार किया।

मामला गंभीर है, स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रसव पीड़िता का उपचार नहीं किया गया। स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल से ही एंबुलेंस बुलाकर प्रसव पीड़िता को भेजना चाहिए था। पूरे मामले की जांच कराई जाएगी। जिसकी लापरवाही मिली, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी- डॉ. आलोक वर्मा , सीएमओ
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