मामला वर्ष 1991 का है। थाना कोतवाली की पुलिस ने आरोपी अमरेंद्र कुमार के खिलाफ गैर कानूनी हथियार रखने के मामले में मुकदमा पंजीकृत किया था। मामले की विवेचना के बाद 25 अप्रैल 1991 को अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया था।
आयुध अधिनियम के एक मामले लगातार गैरहाजिर चल रहे एक मुल्जिम ने 33 साल बाद जिला अदालत में अपना गुनाह कुबूल कर लिया। कोर्ट से कहा...हूजूर बीमार हूं , मेरा कोई पैरोकार भी नहीं है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट शशि कुमार की अदालत ने जमानत से पहले जेल में बिताई अवधि के साथ पांच सौ रुपये अर्थदंड की सजा सुना दी।
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मामला वर्ष 1991 का है। थाना कोतवाली की पुलिस ने आरोपी अमरेंद्र कुमार के खिलाफ गैर कानूनी हथियार रखने के मामले में मुकदमा पंजीकृत किया था। मामले की विवेचना के बाद 25 अप्रैल 1991 को अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया था। शुरुआती दौर में ही आरोपी जमानत पर रिहा किया गया था। मामले की सुनवाई के दौरान वह कोर्ट से लगातार गैरहाजिर रहा।
अदालत ने उसके खिलाफ कई बार वारंट जारी किया, लेकिन वह न खुद हाजिर हुआ न पुलिस उसे अदालत में पेश कर पाई। करीब तीन दशक बाद बृहस्पतिवार को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पहुंचे आरोपी ने अपना गुनाह कुबूल कर लिया। अपनी बीमारी का हवाला देते हुए अदालत से कम से कम सजा सुनाने की गुहार लगाई। कोर्ट ने मामले का निस्तारण करते हुए आरोपी को जमानत से पहले जेल में बिताई अवधि की कैद के साथ पांच सौ रुपये अर्थदंड की सजा सुना दी।