अलग-अलग थानों में समान आरोपों पर नई जांच चलाना आरोपी के अधिकारों के खिलाफ है। साथ ही समान आरोपों पर अलग-अलग जांच कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
इससे विरोधाभासी फैसलों का खतरा रहता है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने परिपक्वता राशि का भुगतान न करने से संबंधित दर्ज सभी एफआईआर को मुख्य पहली एफआईआर से संलग्न करने का आदेश दिया।
ललितपुर जिले की कोतवाली में याची एजेंटों के खिलाफ फर्जीवाड़ा, धोखाधड़ी के आरोप में प्राथमिकी दर्ज है। शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उन्होंने भारत बांध परियोजना से प्राप्त मुआवजे की राशि को याची के आश्वासन पर को-ऑपरेटिव सोसाइटी में पांच साल में दोगुना के के लिए जमा किया था।
परिपक्वता के बाद कंपनी ने उनके रुपयों का भुगतान नहीं किया। इसे लेकर याची के खिलाफ विभिन्न थानों में कई एफआईआर उपभोक्ताओं ने दर्ज कराई। याची ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सभी प्राथमिकी को एक साथ संलग्न किए जाने की गुहार लगाई। याची प्रभात वर्मा के अधिवक्ता ने दलील दी कि किसी एक ही घटना, लेनदेन से जुड़ी अनेक शिकायतें दर्ज कराई जाती हैं, तो बाद की सभी एफआईआर को पहली एफआईआर में सीआरपीसी की धारा 161 और बीएनएसएस की धारा 180 के तहत दर्ज बयान माना जाएगा।
कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए निर्देश दिया है कि जिन मुकदमों में अब तक चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है, उनकी जांच तुरंत कोतवाली ललितपुर स्थानांतरित की जाएगी। इसके अलावा, जिन मुकदमों में ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान ले चुकी हैं, उन मुकदमों और अदालती कार्यवाहियों को भी मुख्य प्राथमिकी के क्षेत्राधिकार वाली अदालत में स्थानांतरित और विलय कर एक साथ चलाया जाएगा।