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Prayagraj: समझौता रक्त रंजित मामलों को रफा-दफा करने का लाइसेंस नहीं, इस चलन से कानून के दुरुपयोग का खतरा

Fri, 01 May 2026 06:40 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

हाईकोर्ट ने कहा कि अनुमति दी गई तो समझौतानामा को ढाल बनाकर अपराधी कानून को बेखौफ हाथ में लेंगे। इससे सार्वजनिक न्याय प्रणाली की इमारत ढह जाएगी। 
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इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आपसी समझौता रक्त रंजित मामलों को रफा-दफा करने का लाइसेंस नहीं है। अनुमति दी गई तो समझौतानामा को ढाल बनाकर अपराधी कानून को बेखौफ हाथ में लेंगे। इससे सार्वजनिक न्याय प्रणाली की इमारत ढह जाएगी। 

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इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की अदालत ने मेरठ निवासी मनोज समेत सात याचियों की ओर से समझौते के आधार पर एफआईआर रद्द करने की मांग खारिज कर दी। मामला मेरठ के खरखौदा थाना क्षेत्र का है। वर्ष 2025 में दो पक्षों के बीच हुए खूनी संघर्ष में बलकटी, लोहे की रॉड, फरसा और चाकू जैसे घातक हथियारों का इस्तेमाल हुआ। 

दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ जानलेवा हमले की एफआईआर दर्ज कराई। कुछ समय बाद दोनों पक्षों ने आपसी समझौता कर लिया। इसके बाद एक पक्ष के मनोज व अन्य छह लोगों ने समझौते के आधार पर एफआईआर रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया। 
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कोर्ट ने पाया कि मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक, चोटें इतनी गंभीर थीं जो प्रथम दृष्टया जान ले सकती थीं। ऐसे मामलों में निजी समझौता कानून की मंशा के खिलाफ है। हालांकि, कोर्ट ने याचियों को राहत दी है कि यदि पुलिस ने उनकी ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर में फाइनल रिपोर्ट लगा दी है तो वे ट्रायल कोर्ट में मामले को खत्म करने के लिए याचिका दाखिल कर सकते हैं। 

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