माघ, अर्द्धकुंभ या महाकुंभ में संगम की रेती पर बसे तंबुओं के शहर या फिर स्नान के दौरान अपनों से बिछुड़ने वालों के लिए 88 वर्षीय राजाराम तिवारी किसी मसीहा से कम नहीं हैं। ऐसे समय में जब लाखों की भीड़ में गुम होकर कोई बेसहारा और नाउम्मीद हो जाए, राजाराम सहारा होते हैं। मेले में हर साल वह भूले भटके लोगों को अपनों से मिलवाते हैं। यह सिलसिला मेले से पहले शुरू होकर मेले के बाद तक चलता है। दूसरों के लिए पूरा जीवन समर्पित करने वाले राजाराम बीते सात दशकों के दौरान तकरीबन तेरह लाख से अधिक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को उनके परिजनों से मिलवा चुके हैं।
संगम की रेती पर लगने वाले मेले में प्रतिवर्ष देश के कोने-कोने से लाखों लोग पुण्य की डुबकी लगाने आते हैं, जिसमें तमाम अपनों से बिछुड़ भी जाते हैं। ऐसे में उन सभी का एक ही ठिकाना होता हैं। त्रिवेणी मार्ग स्थित भूले भटके का शिविर, जहां पहुंचने पर राजाराम तिवारी और उनकी पूरी टीम उसे परिजनों से मिलाने में जुट जाती है। यहां ऐसे लोगों के लिए रहने-खाने का पूरा इंतजाम होता है। जिनके परिजन शिविर तक नहीं पहुंचते उन्हें उनके गांव, जिले तक भी पहुंचाया जाता है, फिर चाहे वह देश के किसी भी कोने का हो।
सेवा को धर्म समझने वाले राजाराम तिवारी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। सेवा कार्य से ही उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की है। बिग बी अमिताभ बच्चन, अजय देवगन और दीया मिर्जा से लेकर जाने कितनी हस्तियां उनकी मुरीद हैं। मूलरूप से प्रतापगढ़ के रहने वाले राजाराम वर्ष 1946 में 18 बरस की उम्र में मेले में बिछड़े लोगों को मिलाने के सेवाकार्य से जुड़े। बोले, मेले में आए तो अपनों से बिछुड़े तमाम लोगों को रोते-बिलखते देखा तो मन द्रवित हो गया। यहीं से उन्हें परिजनों से मिलाने का संकल्प लिया। शुरुआत में साइकिल से घूम-घूमकर भोपू से आवाज लगाकर लोगों की तलाश करते रहे, बाद में इस कार्य से और लोग जुड़ते गए।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष और मठ बाघंबरी गद्दी के महंत नरेंद्र गिरि कहते हैं, राजाराम तिवारी का काम दूसरों के लिए मिसाल है, वह जिस परिश्रम से यह कार्य करते हैं, उससे दूसरों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए। यह श्रद्धालुओं ही नहीं सनातन धर्म और संगम की सेवा है। मैं हर प्रकार से सदैव उनके साथ रहा हूं।
राजाराम तिवारी के छोटे बेटे उमेश चंद्र तिवारी भूले भटके शिविर को संभालते हैं। अपने पिता को अपना आदर्श मानने वाले उमेश कहते हैं, हमने देखा है कि पिताजी ने कितने परिश्रम से इस कार्य के लिए जीवन समर्पित कर दिया। बिछुड़े लोगों को अपनों से मिलाने पर उन्हें खुशी मिलती है, अब अपना भी यही संकल्प हो गया है।