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हाईकोर्ट : माता-पिता में बच्चा जिसके साथ खुश, उसके साथ रह सकता, बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका खारिज

Sun, 04 Feb 2024 02:02 PM IST
विनोद सिंह अमर उजला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बच्चे के लिए दाखिल की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इस मामले की सुनवाई तभी की जा सकती है जब बच्चे की हिरासत अवैध हो। बच्चा मां और पिता में जिसके साथ खुश रहता है उसके साथ उसे रहने का हक है। 
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अदालत। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिता के साथ रह रहे नाबालिग बेटे की कस्टडी मां को देने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि नाबालिग के संरक्षक होने का विवाद बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए याची को निचली अदालत का दरवाजा खटखटाना होगा।

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न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की कोर्ट ने मां की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका निरस्त करते हुए कहा कि कानूनन सात साल के बेटे की विधिक संरक्षक मां ही है, लेकिन इसे हासिल करने के लिए इस कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पोषणीय नहीं है। मां चाहे तो निचली अदालत में संरक्षक होने का दावा कर सकती है।

मामला रामपुर जिले के खजुरिया से जुड़ा है। यहां के मो. इस्माइल की शादी शाहनवाज से हुई थी। वर्ष 2019 में शाहनवाज को बेटा हुआ। कुछ समय बाद पति-पत्नी में मनमुटाव हो गया। पत्नी ने पति के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का मामला दर्ज करवा दिया और बेटे को लेकर मायके चली गई। अप्रैल 2023 में पति अपने चार वर्षीय बेटे को घर ले आया। इस पर पत्नी ने दूसरी एफआईआर दर्ज करा दी।
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याची पत्नी के अधिवक्ता बृजेश कुमार पांडेय ने दलील दी कि चार वर्षीय बेटे को उसके पिता ने अवैध कब्जे में रखा है। सात वर्ष से कम उम्र के बेटे की विधिक संरक्षक उसकी मां होगी। हालांकि, कोर्ट में पेश बेटे ने पिता के साथ ही जाने की इच्छा जताई। बेटे का कहना था कि वह अपने मजदूर पिता के साथ खुश है। कोर्ट ने बेटे का पिता के साथ भावनात्मक लगाव देखते हुए उसे पिता के साथ जाने की इजाजत दे दी।
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