उम्र के संबंध में कोई ठोस प्रमाण नहीं दे सका अभियोजन
बचाव पक्ष की ओर से दलील दी गई कि पीड़िता की उम्र के संबंध में अभियोजन ठोस प्रमाण पेश नहीं कर सका। विद्यालय के अभिलेखों के समर्थन में कोई दस्तावेज नहीं था, जबकि अस्थि परीक्षण रिपोर्ट और सीएमओ की ओर से जारी प्रमाण पत्र के अनुसार युवती की उम्र लगभग 20 वर्ष पाई गई। एफआईआर में भी उसकी उम्र 18 वर्ष छह माह दर्ज थी, जिसे बाद में बदलकर 17 वर्ष बताया गया।
अधिवक्ता ने पीड़िता के बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि उसने स्वयं स्वीकार किया कि वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई, सार्वजनिक बस और ट्रेन से यात्रा की और किसी भी चरण पर मदद के लिए आवाज नहीं दी। वह बंगलूरू में छह माह तक आरोपी के साथ रही और सहमति से शारीरिक संबंध बनाए। आरोपी द्वारा शिकारपुर चौराहे पर छोड़े जाने के बाद ही उसने अपने परिवार से संपर्क किया।
कोर्ट ने कहा कि अपहरण और जबरन विवाह से संबंधित धाराओं में दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। बालिग होने की स्थिति में पॉक्सो एक्ट और दुष्कर्म की धारा भी लागू नहीं होती। एससी/एसटी एक्ट को भी अदालत ने स्वतंत्र अपराध न मानते हुए निरस्त कर दिया। साथ ही सजा भी रद्द कर दी गई की गई कि कथित कृत्य आरोपी पर आरोपित नहीं था।