इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिना जांच जाति प्रमाणपत्र रद्द करना अवैधानिक है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने बरेली के केंद्र पाल की याचिका स्वीकार करते हुए जिला स्तरीय जाति स्क्रूटनी कमेटी के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत याची का जाति प्रमाणपत्र निरस्त किया गया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिना जांच जाति प्रमाणपत्र रद्द करना अवैधानिक है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने बरेली के केंद्र पाल की याचिका स्वीकार करते हुए जिला स्तरीय जाति स्क्रूटनी कमेटी के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत याची का जाति प्रमाणपत्र निरस्त किया गया था।
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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी व्यक्ति का जाति प्रमाणपत्र निरस्त नहीं किया जा सकता। याची ने आठ अक्तूबर 2025 को कमेटी की ओर से पारित आदेश को चुनौती दी थी। याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि जाति प्रमाणपत्र रद्द करने से पहले सुप्रीम कोर्ट के माधुरी पाटिल बनाम अतिरिक्त आयुक्त, आदिवासी विकास मामले में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। विशेष रूप से मामले की जांच के लिए विजिलेंस रिपोर्ट तक नहीं बुलाई गई।
प्रदेश सरकार के अधिवक्ता भी इस तथ्य से इन्कार नहीं कर सके कि प्रमाणपत्र निरस्त करने से पहले विजिलेंस जांच नहीं कराई गई थी। उन्होंने बताया कि अब विजिलेंस जांच के लिए नई कमेटी गठित कर रिपोर्ट मांगी जा रही है। कोर्ट ने पाया कि जिला स्तरीय स्क्रूटनी कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया। आठ अक्तूबर 2025 का आदेश कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं है।