पत्रकारों से बातचीत के दौरान प्रधान महालेखाकार ने बताया कि कुंभ के कार्यों को लेकर कोई मानक तय नहीं किया गया। श्रद्धालुओं की संभावित संख्या को देखते हुए शौचालय की व्यवस्था करने के साथ अन्य कार्य कराए गए होते तो बड़ी धनराशि बचाई जा सकती थी। इसके अलावा न्यूनतम निविदा की बजाय अधिक राशि पर शौचालय लिए गए। कुंभ में अलग-अलग तरीके के शौचालय खरीदे गए थे। फाइबर प्रबलित प्लास्टिक शौचालय 42 हजार रुपये में खरीदे गए।
उन्होंने बताया कि फाइबर प्रबलित प्लास्टिक सेप्टिक 36500 तथा फाइबर प्रबलित प्लास्टिक सोकपिट 29000 की दर से खरीदे गए होते तो 8.75 करोड़ रुपये बचाए जा सकते थे। अधिकतम निविदा पर शौचालय खरीदे जाते तब भी दो करोड़ से अधिक राशि बच जाती। ठेकेदारों को भी 1.27 करोड़ का अतिरिक्त लाभ पहुंचाया गया। कुंभ कार्यों की थर्ड पार्टी जांच कराई गई थी लेकिन जांच करने वाली एजेंसी लेखा टीम के सामने रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर सकी। कुंभ के कई अन्य कार्यों की रिपोर्ट भी उपलब्ध नहीं कराई गई। कुंभ के कार्यों में कई अन्य स्तर पर भी नियमों की अनदेखी तथा अनियमितता सामने आई हैं।
इंडो-नेपाल बॉर्डर रोड परियोजना में भी करोड़ों रुपये का अतिरिक्त भुगतान कर दिया गया है। इतना ही नहीं, निर्माण कार्य भी काफी धीमा है तथा 10 वर्षों में सिर्फ 132 किमी सड़क का निर्माण हो सका है। इसकी वजह से सड़क निर्माण की लागत तो बढ़ ही गई, अधूरी होने की वजह से इसका उपयोग भी नहीं हो पा रहा।
प्रधान महालेखाकार बीके मोहंती ने प्रेसवार्ता में बताया कि उत्तर प्रदेश के अंतर्गत 564 किमी सड़क का निर्माण होना है लेकिन 10 वर्षों में सिर्फ 132 किमी सड़क ही बन पाई है। इसमें भी कई जगहों पर वन विभाग से एनओसी नहीं मिल पाई है। इसकी वजह से बीच-बीच में सड़क का निर्माण नहीं हो सका। इसके अलावा इस मार्ग से सेना के कैंप के बीच लिंक मार्ग का निर्माण भी नहीं हो सका है। इन वजहों से यह सड़क अब तक उपयोग में नहीं आ पाई है। अब तक जमीन का अधिग्रहण भी नहीं हो सका है। इसके अलावा बिजली, टेलीफोन आदि के पोल भी नहीं हटाए गए हैं।
इस विलंब की वजह से परियोजना की लागत 550.12 करोड़ से बढ़ाकर 779.20 करोड़ रुपये कर दी गई है। भूमि अधिग्रहण का खर्च भी 173.53 करोड़ से बढ़ाकर 458.33 करोड़ रुपये कर दिया गया है। सड़क के निर्माण में 84.85 करोड़ रुपये के ब्याज रहित अग्रिम भुगतान करके ठेकेदारों को अतिरिक्त लाभ पहुंचाया गया। इतना ही नहीं, एक ही प्रकार की मशीनों की अलग-अलग कीमत तय की गई। इससे परियोजना की लागत 11.93 करोड़ रुपये बढ़ गई। ऑडिट में कई अन्य तरह की अनियमितताएं भी सामने आई हैं।
सीएजी रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
- केंद्र सरकार के राष्ट्रीय पशुधन मिशन का प्रदेश को 2014 से 2019 के बीच कोई लाभ नहीं मिला
- पशुओं से संबंधित डाटा के लिए 822 कंम्प्यूटर सेंटर हैं लेकिन कोई उपयोग में नहीं
- मेरठ, अलीगढ़ में बिना उपयोग के मांस की गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाओं का निर्माण शुरू हुआ। बीच में परियोजना निरस्त हो जाने से 79.56 लाख का नुकसान हुआ।
- राज्य सडक़ निधि से सडक़ों की मरम्मत में मानदंडों का ध्यान नहीं रखा गया। इससे 16.32 करोड़ रुपये का अधिक व्यय हुआ
- लोक निर्माण विभाग ने ई-टेंडर प्रक्रिया का पालन नहीं किया
- 1396 आईटीआई के निर्माण में मानक का उपयोग नहीं किया गया।
- 14 आईटीआई के निर्माण में 3.36 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान कर दिया गया
- बेसिक शिक्षा में स्कूल बैग की खरीद प्रक्रिया विसंगतिपूर्ण रही
- विलंब की वजह से 2016-17 में 1.15 करोड़ विद्यार्थी बैग से वंचित रह गए
- तीन वर्षों में 9.46 करोड़ रुपये के 6.55 लाख स्कूल बैग पड़े रह गए
- चट्टानों को अनुपयोगी घोषित किए जाने से 28.44 करोड़ का नुकसान हुआ। ठेकेदारों को इसे कम कीमत पर दे दिया गया
- उपखनिजों की कम कीमत पर नीलामी करके ठेकेदारों को 96.98 करोड़ का लाभ पहुंचाया गया
- आगरा के अस्पताल में 10 वर्षों में नहीं हो सका ऑक्सीजन प्लांट का निर्माण
- कई अधूरी तथा अव्यावहारिक परियोजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिए गए