सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव।
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विधानसभा चुनाव से पहले बसपा विधायकों के बगावती तेवर को सपा की बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। इस बहाने पार्टी ने कई सियासी समीकरणों को साधा है। पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण के साथ पार्टी ने संदेश देने की कोशिश की है कि भाजपा के खिलाफ सपा ही मुख्य विपक्षी दल है। हालांकि विधायकों ने बसपा से बगावत की बात तो स्वीकार की है, लेकिन वह किस तरफ जाएंगे इसे लेकर अभी उन्होंने मौन साध रखा है। उनकी इस चुप्पी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ मुलाकात को नकाराने को विधायकी बचाए रखने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है।
विधानसभा चुनाव 2022 के लिए सभी दलों ने तैयारी शुरू कर दी है। सपा के साथ कांग्रेस भी इस बार आक्रामक दिख रही है। सभी विपक्षी दलों के बीच भाजपा के खिलाफ सबसे मजबूत होने की होड़ है, ताकि मतों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में किया जा सके। इस कवायद के बीच प्रतापपुर के बसपा विधायक मुज्तबा सिद्दीकी और हंडिया के हाकिम लाल बिंद समेत पांच विधायकों की बगावत सपा के लिए लाभकारी मानी जा रही है। प्रयागराज की सियासी समीकरण को देखें तो सपा के पूरे मंडल में एक मात्र विधायक उज्जवल रमण सिंह है। ऐसे में हाकिम लाल और मुज्तबा सिद्दीकी की बसपा से नाराजगी पर सपा नेताओं की नजर रही। ये दोनों नेता पार्टी में लंबे समय से खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
लोकसभा चुनाव में इन पर बसपा उम्मीदवार के खिलाफ जाने का भी आरोप लगा था। मौजूदा विधायक होने के बावजूद इनके टिकट कटने की बात भी सामने आने लगी थी। इसके अलावा सियासी हलकों में यह भी चर्चा है कि बसपा सुप्रीमो मायावती हाथरस समेत कई मुद्दों पर उस तरह से मुखर होकर सामने नहीं आईं, जोकि उनकी पहचान है।
ऐसे में बसपा विधायकों ने दूसरे दलों में संपर्क साधना शुरू कर दिया। इस नाराजगी को बगावती रूप देने के लिए सपा हाईकमान ने कभी बसपा में रहे अपने वरिष्ठ नेता को आगे किया। बताया जा रहा है कि उन्हीं सपा नेता की अगुवाई में बगावत की पूरी पटकथा लिखी गई और दोनों विधायकों की अखिलेश यादव से मुलाकात भी कराई गई। हालांकि राज्यसभा के लिए सपा उम्मीदवार का नामांकन रद्द होने के बाद बसपा समेत अन्य सभी दावेदारों का निर्विरोध चुना जाना तय माना जा रहा है। ऐसे में बसपा विधायकों के इस बगावत का सपा को तात्कालिक तौर तो बड़ा फायदा होने नहीं जा रहा लेकिन 2022 में होने वाले चुनाव के मद्देनजर इसे बड़े घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।
जिले की सियासत को देखें तो खासतौर पर, पिछड़ी जाति बहुल वाले हंडिया और प्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र में सपा का मजबूत आधार रहा है। ऐसे में इन दोनों विधायकों के आने से सपा को अपने परंपरागत मतों के ध्रुवीकरण में मदद मिलने की बात कही जा रही है। इसके अलावा बसपा से बगावत करने वाले दोनों नेताओं की विधानसभा सदस्यता बची रहती है तो सपा जिले में तीन मौजूदा विधायकों के साथ आगामी चुनाव में उतरेगी। वहीं अन्य विपक्षी दलों के खाते में एक भी विधायक नहीं होगा। इसका भी सपा को फायदा हो सकता है। ऐसे में बसपा विधायकों के बगावत को सपा के लिए उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है।
- ‘बहनजी (मायावती) आज भी हमारी नेता हैं। हमें उनसे कोई शिकायत नहीं है। हमारी नाराजगी पार्टी कोऑर्डिनेटर से है। पार्टी में हमारी उपेक्षा की जा रही है। बैठकों में हमें नहीं बुलाया जाता है। बैठक में पहुंच भी गए तो पीछे की सीट पर बैठाया गया। बहनजी से मिलने की कोशिश की गई लेकिन उनसे भी नहीं मिलने दिया गया। उनसे मिलकर अपनी बात रख लेते तो हमारा दर्द कुछ कम हो जाता। इसके अलावा हम विधायक हैं। इसके बाद भी दूसरे प्रत्याशी की तलाश की जा रही है। दूसरे दल में जाने का हमलोगों का कोई इरादा नहीं है। हम बसपा में हैं और रहेंगे। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाकात की बात भी झूठी है। यदि पार्टी हमारे के खिलाफ कोई कार्रवाई करती है तो हम 2021 तक देखेंगे और हमें लगेगा कि बसपा से टिकट नहीं मिलेगा तो दूसरी राह पकड़ने के बारे में भी विचार करेंगे।’ - हाकिम लाल बिंद, विधायक