इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि टूटे रिश्तों के इंतकाम में दर्ज हो रहे आपराधिक मुकदमे चिंताजनक हैं। शादी का झूठा वादा और वादा न निभा पाना दोनों में फर्क होता है। शुरू से ही धोखे की नीयत न हो तो शादी का वादा टूटना दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि टूटे रिश्तों के इंतकाम में दर्ज हो रहे आपराधिक मुकदमे चिंताजनक हैं। शादी का झूठा वादा और वादा न निभा पाना दोनों में फर्क होता है। शुरू से ही धोखे की नीयत न हो तो शादी का वादा टूटना दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने कानपुर निवासी युवक के खिलाफ दुष्कर्म के आरोप में लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि तीन साल तक सहमति से बने संबंधों वाली प्रेम-कहानी को महज इसलिए दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता, क्योंकि शादी नहीं हो सकी।
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पीड़िता ने आरोप लगाया था कि 2021 से 2024 के बीच दोनों सहपाठी थे। इसी दौरान आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ संबंध बनाए। जब युवक को नौकरी मिली तो उसके पिता ने शादी से इन्कार कर दिया। इसके बाद पीड़िता ने दिसंबर 2024 में एफआईआर दर्ज कराई। कोर्ट ने पाया कि पीड़िता समझदार वयस्क महिला थी। तीन साल संबंध में रहने के दौरान उसने कोई शिकायत नहीं की। अभिलेखों पर उपलब्ध फोटोग्राफ व गवाह इस तथ्य की पुष्टि करते हैं।