मुंशी प्रेमचंद की पौत्री सारा रॉय ने कहा विश्व पटल पर बनी हिंदी की पहचान
सारा बताती हैं कि इस ऊंचाई तक पहुंचने वाली गीतांजलि ने अपनी कहन शैली के खास हुनर के साथ अपने मुहावरे भी गढ़े हैं। गीतांजलि को बुकर मिलने से अब हिंदी के अन्य रचनाकारों की कृतियों की तरफ भी दुनिया के अन्य लेखक, प्रकाशक और अनुवादक सहज आकर्षित होंगे। हिंदी की विश्व पटल पर छाप तो पड़ी ही, पहचान भी बनी है। हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए चल रहे अभियानों के बीच बुकर की उपलब्धि पर सरकार की चुप्पी से कथाकार सारा भी असहज हैं। वह कहती हैं कि हो सकता है कि सरकार की इसके पीछे कोई नीति हो, लेकिन हिंदी के लिए यह बहुत बड़ा मान है। इसका आदर किया ही जाना चाहिए।
वह कहती हैं कि हो सकता है कि सरकार को लंदन से गीतांजलि श्री के दिल्ली लौटने का इंतजार हो। वह कहती हैं कि सरकार का चाहे जो भी रुख हो, लेकिन हम सब इस उपलब्धि पर गदगद हैं। इसी तरह उनकी बचपन की सहेली सेवा निवृत्त रेल अफसर गौरी सक्सेना भी सरकार की चुप्पी से आहत हैं। गौरी कहती हैं कि ओलंपिक में तो एक मेडल मिलने पर सरकार सारा जहां सिर पर उठा लेती है, लेकिन इस उपलब्धि पर खामोशी क्यों बरती जा रही है, समझ से परे है। उनका मानना है कि इस पुरस्कार ने उन हिंदी रचनाकारों के लिए अवसरों के द्वार खोल दिए हैं जो इसके हकदार हैं। इससे हिंदी में वैश्विक स्तर पर रोजगार भी बढ़ेगा।
वैश्विर स्तर पर हिंदी को मिला वाजिब दर्जा, अब अनुवाद में आएगी तेजी
गीतांजलि की बड़ी बहन गायत्री की सहेली प्रो. आशा लाल कहती हैं कि इस बुकर से प्रमाणित हो गया है कि हिंदी साहित्य वैश्विक स्तर पर अपना वाजिब दर्जा पाने की ओर बढ़ रहा है। अब हिंदी साहित्य का अनुवाद पहले की तुलना में तेजी से बढ़ेगा। लेकिन, इतने बड़े बुकर पुरस्कार की उपलब्धि हासिल होने के बाद अभी तक पीएम नरेंद्र मोदी ने गीतांजलि को बधाई तक नहीं दी है। सरकार के किसी मंत्री ने इस बुकर सम्मान पर अभी तक अधिकारिक टिप्पणी नहीं की है। इसे लेकर अफसोस भी है। इसलिए कि यह उपलब्धि सिर्फ गीतांजलि श्री की नहीं, बल्कि पूरे हिंदी समाज की है। आशा लाल को गीतांजलि के भारत वापस आने का इंतजार है। वह कहती हैं कि गीतांजलि के आने के बाद हो सकता है कि सरकार इस उपलब्धि पर खुशी जताए।