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Bashir Badr Death : सात साल की उम्र में इश्क पर लिखा शेर, पिता से मिली पिटाई और दुनिया से तालियां

Fri, 29 May 2026 01:56 PM IST
विनोद सिंह अमित सरन, प्रयागराज

सार

15 फरवरी 1935 को जन्मे और मूलत: अयोध्या (तब फैजाबाद) के बकिया गांव के रहने वाले डॉ. बशीर बद्र ने सात साल की उम्र में पहला शेर लिखा था... ‘हवा चल रही है उड़ा जा रहा हूं/तेरे इश्क में, मैं मरा जा रहा हूं।’
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बशीर बद्र का हआ निधन। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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15 फरवरी 1935 को जन्मे और मूलत: अयोध्या (तब फैजाबाद) के बकिया गांव के रहने वाले डॉ. बशीर बद्र ने सात साल की उम्र में पहला शेर लिखा था... ‘हवा चल रही है उड़ा जा रहा हूं/तेरे इश्क में, मैं मरा जा रहा हूं।’ इस पर पिता ने उनकी खूब पिटाई की थी। साथ ही शायरी से दूर रहने की हिदायत दी थी।

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आगे चलकर मुशायरे की दुनिया में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। डॉ. बशीर बद्र को वर्ष 1999 में पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया। वर्ष 1996 में मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी ने उन्हें ‘मीर तकी मीर अवार्ड’ प्रदान किया। डॉ. बशीर बद्र का आशियाना कभी शहर के दायराशाह अजमल मोहल्ले में हुआ करता था। तब के इलाहाबाद में छह साल रहकर उन्होंने पुलिस मुख्यालय में लिपिक के पद पर काम किया।

हिंदुस्तानी साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका गुफ्तगू के संस्थापक डॉ. इम्तियाज अहमद गाजी बताते हैं कि प्रयागराज के दायराशाह अजमल के अजमल अजमली से उनकी बहुत अच्छी दोस्ती थी। इस वजह से वह वहीं रहते थे। वर्ष 1961 से 1967 तक उन्होंने अपनी जिंदगी का बेशकीमती समय प्रयागराज में ही बिताया।
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उनका दुनिया से जाना मुशायरे की दुनिया के लिए एक बड़ा झटका है। प्रयागराज छोड़ने के बाद वर्ष 2005 में वे आखिरी बार यहां के उत्तर मध्य सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित मुशायरे में शामिल हुए थे। हालांकि, इससे पहले भी वह मुशायरों में शामिल होने बराबर प्रयागराज आते रहे थे। मुशायरे में उनकी मौजूदगी कार्यक्रम की कामयाबी की गारंटी हुआ करती थी।

...जब फिराक ने पूछा बद्र से, क्या शायरी करते हो

साहित्यकार एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में शिक्षक रहे प्रो. अली अहमद फातमी बताते हैं कि 1974-75 की बात है, जब डॉ. बशीर बद्र शेरवानी फैक्ट्री में मुशायरे में शामिल होने आए थे। वह फिराक गोरखपुरी से मिलना चाहते थे। उस वक्त प्रो. फतमी विश्वविद्यालय में शोधार्थी थे। डॉ. बशीर के कहने पर वह उन्हें फिराक गोरखपुरी के पास ले गए। बताया कि कोई मिलने आया है। फिराक साहब ने डॉ. बशीर बद्र से बहुत ही अदब से पूछा कि क्या शायरी करते हो? डॉ. बशीर उस वक्त मुशायरे में काफी नाम कमा चुके थे।

डॉ. बद्र कहते थे, मैं तो सप्लाई इन डिमांड का शायर हूं

साहित्यकार प्रो. अली अहमद फातमी बताते हैं कि 70 व 80 के दशक में डॉ. बशीर बद्र काफी बड़ा नाम हुआ करता था। डॉ. बद्र जब भी उनसे मिले तो यही कहते कि वह तो सप्लाई इन डिमांड के शायर हैं। श्रोताओं को जो पसंद है, वही सुनाते हैं। प्रो. फातमी का मानना है कि डॉ. बशीर के जाने से ‘पॉपुलर मुशायरे’ को हुई क्षति की भरपाई अब मुश्किल है।
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भोपाल में हुई थी प्रो. फातमी की आखिरी मुलाकात

प्रो. अली अहमद फातमी ने बताया कि आठ साल पहले वह मध्य प्रदेश सरकार से अवार्ड लेने भोपाल गए थे, तब डाॅ. बशीर बद्र से उनकी मुलाकात हुई थी। डॉ. बशीर काफी बीमार थे और बहुत कुछ भूल चुके थे। काफी याद दिलाने पर थोड़ा बोले और फिर उन्हें काफी देर तक निहारते रहे।

डॉ. बशीर की रचनात्मकता में झलकता था उनका संघर्ष: रविनंदन सिंह

साहित्यकार रविनंदन सिंह बताते हैं कि डॉ. बशीर बद्र का जीवन अनेक संघर्षों से गुजरा। 1987 के मेरठ दंगों की आग में उनका घर और निजी पुस्तकालय जल गया। इस घटना ने उनके मन को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। इस पीड़ा की छाया उनकी अनेक गजलों और शेरों में दिखाई देती है। व्यक्तिगत दुख को उन्होंने अपनी रचनात्मक शक्ति बना लिया। उसी दौर में उन्होंने यह मशहूर शेर लिखा था, ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।’ मुशायरे की दुनिया में 1974 से 1990 के बीच का दौर उनके रचनात्मक जीवन का अहम समय माना जाता है। इसी दौरान उनकी शायरी ने देश और विदेश में पहचान बनाई। उनकी जगह कोई नहीं ले सकता।
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