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बैंकों में कतार, संडे हुआ बेकार

Mon, 14 Nov 2016 01:05 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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शहरियों के लिए संडे इस बार बेकार हो गया। पूरा दिन बैंक में पैसा जमा करने, निकालने या नोट बदलवाने में ही बीत गया। दिन लंबी कतार में बीत गया और पैसे का इंतजाम हुआ तो शाम को जरूरत का सामान खरीदने निकल पड़े और जो खड़े-खड़े थक गए थे, वे घर जाकर बैठक गए। वरिष्ठ नागरिक हों या महिलाएं, सभी पूरे दिन बैंकों के बाहर कतार में लगे रहे और अफरातफरी के हालात बने रहे। लोगों को मालूम था कि सोमवार को बैंक बंद रहेंगे, सो भीड़ सुबह से ही जुट गई। कहीं बैंककर्मियों से ग्राहक उलझ पड़े तो कहीं लाइन में खड़े लोग आपस में ही भिड़ गए और मारपीट कर ली। परेशानहाल लोग कभी बैंक तो कभी सरकार को कोस रहे थे।
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दोपहर 12.30 बजे का वक्त था। इसी भीड़ में शामिल जॉर्जटाउन की साधना आईसीआईसी आई टैगोर टाउन ब्रांच में नोट बदलवाने के लिए लाइन में लगी थीं। चेहरे पर परेशान साफ झलक रही थी। घर में दवा की जरूरत थी लेकिन पर्स खाली था। बताया कि पहले एलआईसी कॉलोनी स्थित एचडीएफसी बैंक पहुंचीं। वहां गार्ड ने रोक दिया और कहा कि बैंक में शनिवार से पैसा नहीं है। इसके बाद टैगोर टाउन स्थित एसबीआई बैंक की ब्रांच में पहुंचीं, वहां इतनी लंबी लाइन लगी थी कि रात तक नंबर आ पाना मुश्किल लग रहा था। फिर टैगोर टाउन में ही आईसीआईसीआई बैंक पहुंची। वहां महिलाओं की अलग से लाइन लगी थी और बैठने की व्यवस्था भी थी। फिलहाल तीन दिन घंटे बाद उनका नंबर आया और पैसा मिलते ही वह दवा की दुकान की ओर भागीं। 

एसबीआई मुख्य ब्रांच (त्रिवेणी ब्रांच) के बाहर चाय की दुकान पर अल्लापुर के जितेंद्र पटेल सिर पकड़ बैठे थे। बार-बार कहीं फोन मिला रहे थे और एक बार तो बात करते-करते फफक पड़े। जितेंद्र ने बताया कि वह माइग्रेन के मरीज हैं और सरकारी सेवा से रिटायर हो चुके हैं। सुबह से लाइन में लगे हुए थे। सिर में तेज दर्द था। बर्दाश्त नहीं हुआ तो चाय की दुकान में आकर बैठ गए। अब लाइन में लगने की हिम्मत नहीं है। पैसे की सख्त जरूरत है। जेब में सिर्फ इतना पैसा है कि रिक्शे वाले को देकर घर पहुंच सकें। वह अपनी पत्नी के साथ अकेले रहते हैं। बेटा बाहर नौकरी करता है। समझ में नहीं आ रहा कि अब क्या करें।
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एक निजी कंपनी में कर्मचारी मनोज पैसा निकालने के लिए सुबह से ही कतार में खड़े थे। हर संडे वह पत्नी और बच्चों संग घूमने निकलते हैं। समय मिला तो फिल्म भी देख ली। रात का भोजन रेस्टोरेंट में ही होता है लेकिन यह संडे उनके लिए बेकार गया। मनोज का कहना था कि जो हालात हैं, उसे देखकर लगता है कि शाम पांच बजे से पहले नंबर नहीं आने वाला। अगर नंबर आ भी गया तो जो पैसा मिलेगा, उससे पहले जरूरत का सामान खरीदेंगे। उनका कहना था कि दिन-रात की मेहनत का क्या मतलब। सरकार ने आम लोगों की दिक्कत ही नहीं देखी और उन्हें अपने ही पैसों के लिए तरसा दिया।
ग्रुप बनाकर नोट बदलवाने पहुंचे, पूछताछ हुई तो भागे

- लोगों एक ग्रुप रोज अलग-अलग आईडी लेकर नोट बदलवाने पहुंच रहा है। रविवार को भी एसबीआई की मेन ब्रांच में इस ग्रुप के लोग देखे गए। शक होने पर वहां तैनात एक कर्मचारी ने उनसे पूछताछ शुरू कर दी। कर्मचारी ने उनसे कहा, ‘तुम सब रोज आ रहे हो और आईडी बदलकर ला रहे हो।’ इस पर वहां भीड़ जमा हो गई। लाइन में पीछे खड़े लोग भड़क गए। ग्रुप के लोगों ने स्थिति बिगड़ते देखी तो वहां से भाग खड़े हुए। 

- एसबीआई त्रिवेणी शाखा (मेन ब्रांच) में रविवार दोपहर एक रोचक मामला सामने आया। एक युवक खाते से पैसा निकालने पहुंचा। जैसे ही कंप्यूटर में उसका एकाउंट नंबर फीड किया गया तो बैंक कर्मियों को पता चला कि उसने रविवार को ही अपने एटीएम से भी दो हजार रुपये निकाले हैं। इस पर तुरंत अमाउंट कम कर दिया गया और उसे आठ हजार रुपये का ही भुगतान किया गया, क्योंकि एक दिन में दस हजार रुपये से अधिक रकम नहीं निकाली जा सकती।

- तुलारामबाग के आरके सिंह का इलाहाबाद बैरहना शाखा में खाता है। रविवार को उन्होंने खाते में पैसा जमा किया और दस हजार रुपये निकाले। बैंक कर्मियों ने उन्हें दो-दो हजार की नोटें थमा दीं। आरके सिंह नोट लेने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने बैंककर्मियों से कहा कि सो-सौ की नोट दें लेकिन बैंक कर्मी इसके लिए तैयार नहीं हुए। इस पर बैंक कर्मियों और आरके सिंह के बीच भिड़ंत हो गई। लाइन में पीछे खड़े लोगों ने भी आरके समर्थन किया और कहा कि दो हजार का जब फुटकर ही नहीं मिलेगा तो इसे लेने का क्या फायदा। काफी देर झिकझिक के बाद भी आरके सिंह को दो हजार की नोट लेकर लौटना पड़ा और देर रात तक नोटें उनकी जेब में ही पड़ी रह गईं। इससे न दूध मिला और न ही सब्जी।

- दिनभर की जद्दोजहद के बाद हाथ में पैसे आए तो कोई सब्जी या दवा खरीदने दौड़ा तो कोई थकान मिटाने के लिए पीवीआर या दूसरे सिनेमा घरों में पहुंच गया। रविवार शाम पीवीआर और सिनेमाघरों में थोड़ी भीड़ नजर आई। इनमें 90 फीसदी युवा थे। परिवार वाले तो रोजमर्रा की जरूरत पूरा करने के लिए ही परेशान थे। 
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