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गोल्ड लोन अदा करने में चूके तो बंधक सोने की नीलामी गलत नहीं

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गोल्ड लोन अदा करने में चूके तो
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बंधक सोना की नीलामी गलत नहीं
कर्जदार शेष रकम पाने का हकदार : उपभोक्ता फोरम
प्रयागराज। जिला उपभोक्ता फोरम ने कहा है कि सोना बंधक रखकर लोन लेने वाला व्यक्ति यदि कर्ज ली गई रकम चुकाने में नाकाम रहता है तो बैंक द्वारा सोना नीलाम कर लोन की वसूली करना गलत नहीं है। फोरम ने नीलामी में मिली धनराशि में से लोन की राशि काटने के बाद बची हुई रकम वापस पाने का ग्राहक को हकदार माना है। यह फैसला जिला उपभोक्ता संरक्षण फोरम के अध्यक्ष सुखलाल एवं सदस्य सुमन पांडे की खंडपीठ ने करछना निवासी सुभाष चंद्र यादव की ओर से पेश परिवाद पर उनके अधिवक्ता योगेंद्र सिंह चौहान तथा आईसीआईसीआई बैंक के पक्ष को सुनने के बाद दिया।
फोरम में की गई शिकायत में कहा गया था कि 13 दिसंबर 2011 को सुभाष चंद्र ने 30 हजार रुपए का लोन आईसीआईसीआई बैंक से लिया था। वहां बंधक के रूप में एक सोने की अंगूठी तथा दो सोने की चूड़ी गिरवी रखी थी, जिसकी कीमत उस समय 52,240 हजार थी। 14 अगस्त 2013 को 15 हजार रुपये तथा नौ सितंबर 2012 को 5 हजार रुपये बैंक में जमा कर दिए। जब वह दोबारा बैंक में अपना कर्ज अदा करने पहुंचा तो बताया गया कि 30 हजार रुपये कर्ज की रकम बाकी थी, जिसे उसके बंधक सोने के गहनों को नीलाम कर वसूल कर लिया गया है और जो धनराशि बची है उसे वापस कर दिया जाएगा। बैंक की ओर से कहा गया कि छह महीने की अवधि के बाद भी जब कर्ज अदा नहीं किया गया तो नोटिस भेजा गया। नोटिस पर भी जब कोई जवाब नहीं दिया गया तो बंधक के रूप में रखे गहनों को नीलाम कर दिया गया। जिससे जो रुपए प्राप्त हुए उसमें नीलामी का शुल्क और अखबार में प्रकाशन का शुल्क काटकर हुए टैक्स को समायोजित करके जो शेष धनराशि बची थी उसे बैंक ड्राफ्ट बनाकर कर्जदार के पते पर कोरियर से भेज दिया गया है।
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फोरम का निष्कर्ष
फैसले में कहा गया कि बैंक से कर्ज लेना कर्ज के एवज में गहनों को बंधक रखना दोनों पक्षों को स्वीकार है। कर्ज की अदायगी समय से नहीं की गई यह भी स्वीकार है , कर्ज अदा नहीं करने पर गहनों को नीलाम किया गया है, लेकिन नीलामी से प्राप्त रकम में से टैक्स व खर्चों को काटने के पश्चात जो रुपए शेष हैं, उसे परिवादी को दिया गया। लेकिन उसे प्राप्त होने का कोई सबूत बैंक पेश नहीं कर सका है। इसलिए परिवादी को बैंक शेष रकम ब्याज सहित एक महीने में अदा करें साथ ही बैंक पांच हजार रुपये परिवादी को मानसिक क्षतिपूर्ति तथा मुकदमे का खर्चा एक हजार रुपये भी अदा करे।
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