धीरे धीरे अशरफ अपने बड़े भाई अतीक की उंगली पकड़कर अपराध की दुनिया में आ गया। उसके खिलाफ भी मुकदमे दर्ज होने लगे। अतीक ने उसे खूब बढ़ावा दिया। अशरफ ने 2004 में एक ऐसी जिद की, जिसने अतीक की तबाही की पटकथा लिख दी। अतीक के सांसद बनने के बाद शहर पश्चिम की सीट खाली हो गई। अशरफ ने विधायक बनने की जिद पकड़ ली। अतीक ने भी उसकी जिद का मान रखा।
अशरफ को सपा से टिकट मिल गया, लेकिन बसपा के राजू पाल ने अशरफ को पटखनी दे दी। हार के बाद अशरफ रो पड़ा। अतीक ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा कि वह उसे विधायक बनवाकर रहेगा। उसने राजू पाल की हत्या करा दी। फिर से चुनाव हुए। अशरफ इस बार शहर पश्चिम का विधायक बन गया। अतीक ने अपना वादा निभाया, लेकिन उसके अंत की शुरुआत इसी के साथ हो गई।
बसपा सरकार बनने के बाद अतीक और अशरफ साथ में ही फरार हुए। हालांकि, दोनों अलग-अलग पकड़े गए थे। 2017 में भाजपा सरकार बनने के बाद अतीक को जेल भेज दिया गया था, लेकिन अशरफ फरार हो गया था। वह 2020 में वह पकड़ा गया। उमेश पाल हत्याकांड में भी अतीक और अशरफ को साथ में नामजद किया गया। पुलिस ने दोनों की कस्टडी रिमांड भी साथ में ली। अतीक और अशरफ जीवन भर एक दूसरे के राजदार बने रहे। 15 अप्रैल को दोनों की जब हत्या की गई, उस समय हथकड़ी में बंधे होेने के कारण दोनों भाइयों के हाथ एक दूसरे से बंधे रहे।