सुदूर ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं। स्वास्थ्य केंद्रों में गर्भवती महिलाओं का प्रसव कराने की व्यवस्था न के बराबर है। मामला गंभीर हुआ तो उन्हें अस्पताल तक ले जाने के लिए सरकारी एंबुलेंस नहीं मिलेगी। नि:शुल्क मिलने वाली एंबुलेंस सेवा भी पहुंच या तकनीकी रूप से दक्ष लोगों लोगों के लिए ही है। डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री समेत चार मंत्रियों के शहर में सरकारी एंबुलेंस सेवा का यह सच मुंह चिढ़ाने जैसा है। अमर उजाला ने एक बेबस पिता का यह दर्द प्रमुखता से उठाया तो अफसर जागे। मामले की जांच शुरू कर दी गई है।
रविवार को खीरी इलाके में प्रसूता रन्नो और उसके पति आदिवासी किसान सूबे लाल के सपने एंबुलेंस न मिलने से टूट गए। इलाज के लिए भटकने से रन्नो के बच्चा दुनिया नहीं देख सका। मंगलवार को पेट में ही गर्भस्थ शिशु की मौत हो गई। हद तब हो गई जब कुछ समय पहले ऑपरेशन से जन्मे नवजात का शव ले जाने के लिए भी उसके पिता को एंबुलेंस मुहैया नहीं हो सकी।
साफ है कि सरकार की एंबुलेंस सेवा आम आदमी की पहुंच से दूर है। परेशान सूबे लाल को नियमों में बंधे सरकारी एंबुलेंस चालक ने एसआरएन अस्पताल से घाट तक ले जाने से मना कर दिया। मरीजों को परेशानी में फंसा कर मोटी रकम ऐंठने वाले निजी एंबुलेंस चालकों ने उसकी जेब में पैसे न होने की बात सुनकर झिड़क दिया। व्यवस्था और बदहाली से त्रस्त सूबे लाल चिलचिलाती धूप में नवजात के शव को कलेजे से लगाए अंतिम संस्कार के लिए आठ किलोमीटर पैदल चलकर संगम घाट तक गया। अफसर कह रहे हैं कि पीड़ित किसान ने एंबुलेंस की मांग ही नहीं की। जबकि बड़ा सवाल है कि खीरी और कोरांव के स्वास्थ्य कर्मियों ने उसे इस बारे में परेशान दंपति को जानकारी क्यों नहीं दी।
रन्नो बार बार पूछ रही कहां है मेरा बच्चा
एसआरएन अस्पताल के आईसीयू में भर्ती रन्नो की हालत अब पहले से बेहतर है। अब वह पति सूबे लाल से बार बार पूछ रही है कि उसका बच्चा कहां है। सूबे लाल उसे तसल्ली देने के लिए बताते हैं कि बच्चा भर्ती है। रन्नो को नहीं मालूम कि जिसे उसने नौ महीने गर्भ में पाला, वह अब इस दुनिया में नहीं है। डॉक्टरों के मुताबिक इस स्थिति में मरीज को सच्चाई से दूर रखना ही उसकी सेहत के लिए बेहतर होगा। रन्नो का इलाज तो प्रसूती विभाग में हो रहा है लेकिन फिलहाल उसे मदद की दरकार है।
अस्पताल तक ले जाने के लिए है एंबुलेस सेवा
सूबे की सरकार की ओर से आपात स्थिति में मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने एंबुलेंस सेवा है। प्रसव पीड़ित माहिलाओं के लिए 102 और अन्य गंभीर मरीजों के लिए 108 नंबर एंबुलेंस सेवा उपलब्ध है। नियमत: मरीज को अपने फोन से उक्त नंबर डॉयल करना होता है। कंट्रोल रूम से नजदीकी एंबुलेंस वाले को मौके पर भेजा जाता है। सरकारी एंबुलेंस सिर्फ मरीजों को पिकअप कर अस्पताल तक पहुंचाने के लिए है। ड्राप करने( अस्पताल से घर छोड़ने) के लिए नहीं।
जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर खीरी इलाके के कल्याणपुर में रहने वाले आदिवासी किसान सूबे लाल की गर्भवती पत्नी रन्नो को रविवार को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। वह पत्नी को खीरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले गया। वहां डॉक्टर नहीं थे। वहां से सूबेलाल उसे कोरांव स्वास्थ्य केंद्र ले गया। यहां न डॉक्टर थे न ही प्रसव कराने की सुविधा। परेशान सूबेलाल ने आननफानन में किराए पर टेंपो की और पत्नी को लेकर शहर आया। शहर में बेली और डफरिन अस्पताल में उसकी हालत गंभीर देख एसआरएन के लिए रेफर कर दिया गया। एसआरएन पहुंचने तक रन्नो की हालत गंभीर हो चुकी थी। सोमवार सुबह रन्नों का ऑपरेशन किया गया। उसने मृत बच्ची को जन्म दिया। सूबेलाल बच्चे के न रहने की खबर पाकर रो पड़ा। उसे नवजात के शव का अंतिम संस्कार करने के लिए संगम घाट तक जाने को एंबुलेंस नहीं मिली। परेशान सूबे लाल गोद में नवजात का शव लेकर आठ किलोमीटर पैदल चलकर संगम के निकट गंगा घाट पहुंचा। वहां उसने बेटी का परंपरा के मुताबिक अंतिम संस्कार किया। मंगलवार को भी सूबेलाल गुमसुम था। उसकी आवाज गले में फंस रही थी। बस वह इतना ही कह सका, जेब में पैसे होते तो औलाद बच जाती।
कोरांव में प्रसव पीड़िता का प्राथमिक उपचार किया गया। वहां प्रसव की व्यवस्था नहीं थी इसलिए उसे डफरिन के लिए रेफर किया गया। स्वास्थ्य केंद्र पर एंबुलेंस बुलाकर प्रसव पीड़िता को डफरिन भेजना चाहिए था। सभी स्वास्थ्य केंद्र प्रभारियों को निर्देश दिए गए हैं गंभीर मामलों में खुद पहल कर मरीज को ही नियमों की जानकारी देकर एंबुलेंस बुलाएं और मरीज को अस्पताल भेजे। पूरे मामले की जांच कराई जा रही है। जिसकी लापरवाही मिली, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी- डॉ. आलोक वर्मा , सीएमओ
अस्पताल में आपात स्थिति के लिए एंबुलेंस व शव वाहन मुहैया कराए जाते हैं। सूबेलाल ने इस तरह की कोई मांग नहीं की, न ही मामला जानकारी में आया। ऐसी स्थिति में एंबुलेंस अस्पताल में न होती तो व्यवस्था कराई जाती। मामला जानकारी में आया है। रन्नो का बेहतर उपचार किया जा रहा है।
-डॉ. करुणाकर द्विवेदी, एसआईसी एसआरएन अस्पताल