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अमर उजाला संवाद : दूसरी भाषाओं से अलग किया तो जनसामान्य से दूर हो जाएगी हिंदी, मां की भूमिका में मातृभाषा

Sat, 14 Sep 2024 11:48 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर अमर उजाला प्रयागराज कार्यालय में आयोजित संवाद में हिंदी साहित्य, संस्कृति और भाषा से जुड़े विद्वतजन ने उक्त विचार रखे।भाषाविद पृथ्वीनाथ पांडेय ने बोलचाल में हिंदी की शुद्धता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज के युग में अगर हम सार्वजनिक रूप से कुछ कहते हैं तो उसका संप्रेषण दूर तक होता है।
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अमर उजाला संवाद में हिस्सा लेने पहुंचे साहित्यकार। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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हिंदी को मातृभाषा कहा गया है। ऐसे में इसकी भूमिका मां की तरह है जो संस्कृत, अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी सहित कई अन्य भाषाओं को अपने भीतर समाहित किए हुए है। हिंदी को अगर अन्य भाषाओं से अलग कर दें तो यह जनसामान्य से दूर हो जाएगी। आवश्यकता है कि अन्य भाषाओं की सामग्री का हिंदी में अनुवाद कर इसे समृद्ध करें, तभी हिंदी जन-जन की भाषा हो सकेगी।

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हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर अमर उजाला प्रयागराज कार्यालय में आयोजित संवाद में हिंदी साहित्य, संस्कृति और भाषा से जुड़े विद्वतजन ने उक्त विचार रखे।भाषाविद पृथ्वीनाथ पांडेय ने बोलचाल में हिंदी की शुद्धता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज के युग में अगर हम सार्वजनिक रूप से कुछ कहते हैं तो उसका संप्रेषण दूर तक होता है। ऐसे में लोगों को इसके प्रति जागरूक होना होगा। वहीं जाने-माने साहित्यकार यश मालवीय, श्लेष गाैतम, अनुपम परिहार, विवेक निराला, कुंतक मिश्रा और विज्ञान परिषद के उपसचिव राजेंद्र प्रसाद मिश्र ने जनसामान्य में प्रचलित शब्दों के प्रयोग पर जोर दिया।

वक्ताओं ने कहा कि हिंदी वाले ही इसके दुश्मन हैं। हिंदी के विद्वानों और पंडितों ने ही इसका नुकसान किया है, जबकि आवश्यकता है कि हम उदारतापूर्ण तरीके से हिंदी को समृद्ध करने का प्रयास करें और दूसरी भाषाओं के तथ्यों का अधिक से अधिक अनुवाद कर हिंदी के विकास में योगदान दें। संध्या नवोदिता ने कहा कि हम हिंदी की बात करते हैं, लेकिन बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाकर उनके बेहतर भविष्य का सपना देखते हैं।

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हिंदी का शुद्ध लेखन व उच्चारण जरूरी : पृथ्वीनाथ

भाषाविद पृथ्वीनाथ पांडेय ने कहा कि हिंदी का शुद्ध लेखन जरूरी है। भाषा की अशुदि्धयां खाने में कंकड़ की तरह खटकती हैं। इससे कहीं न कहीं भाषा के विकास का क्रम बाधित होता है। इसके लिए जरूरी है कि शुद्ध हिंदी पढ़ाई जाय और सही उच्चारण किया जाए।

भाषा समय के साथ चलती है : अनुपम

साहित्यकार अनुपम परिहार ने कहा कि भाषा समय के साथ चलती है। जन सामान्य में जो भाषा प्रचलित है वही आगे बढ़ती है। हिंदी में कई दूसरी भाषाएं समाहित हैं और स्वीकार्य भी हैं। इससे हम हिंदी भाषा को समृद्ध कर सकते हैं।

संग्रहालय की विषय वस्तु नहीं है भाषा : निराला

साहित्यकार विवेक निराला ने कहा कि भाषा को संग्रहालय की विषय वस्तु नहीं बना सकते, जो प्रचलन में वह मान्य होनी चाहिए। भाषा बहता नीर है। इसे बांधकर नहीं रखा जा सकता है, जहां भाषा के लिए बाउंड्री बनी, वहीं उसका विकास थम जाता है।

हिंदी में हम व्याकरण ढूंढते हैं, इसलिए अंग्रेजी ने लगाई सेंध : यश मालवीय

साहित्यकार यश मालवीय ने कहा कि हिंदी वाले ही हिंदी के दुश्मन हैं, जो इसे सीमाओं में बांधते हैं। हिंदी में हम व्याकरण ढूंढते रहते हैं, यही कारण है कि हिंदी के घर में अंग्रेजी ने सेंध लगा लिया है। हिंदी ने कई भाषाओं के शब्दों को अपने में शामिल किया है।

भाषा विकास के लिए भी बदलाव जरूरी : कुंतक

हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमंत्री कुंतक मिश्रा ने कहा कि भाषा विकास के लिए भी बदलाव की जरूरत है। हिंदी साहित्य सम्मेलन ने स्थापना से लेकर अब तक बहुत कम बदलाव किया है, इसलिए प्रगति के पथ पर पिछड़ गया है। उन्होंने हिंदी में तकनीक क्षेत्र की शब्दावली कम होने पर चिंता जताई।

भाषा विकास के लिए कंटेंट आवश्यक : नवोदिता

साहित्यकार संध्या नवोदिता ने कहा कि भाषा विकास के लिए कंटेंट आवश्यक है। जिस भाषा का कंटेंट अच्छा होगा, वहीं विकास करेगी। दूसरी भाषाओं से हिंदी में अनुवाद कम हो रहा है। यही कारण है कि कई विषयों पर हिंदी में तथ्यों का अभाव है।

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भाषा कठिन होने से विकास होगा अवरुद्ध : गाैतम
 
साहित्यकार श्लेष गाैतम ने कहा कि जो शब्द सहज स्वीकार हैं, वह भाषा विकास को गति देने में सहायक होते हैं। हिंदी भाषा तो सबको साथ लेकर चलती है। जब हम इसे कठिन कर देंगे तो जनसामान्य इससे दूर भागेंगे। इससे भाषा का विकास भी अवरुद्ध हो जाएगा।
 
विज्ञान के लिए हिंदी का समावेशी होना जरूरी : आरपी मिश्रा
 
विज्ञान परिषद के संयुक्त सचिव आरपी मिश्रा ने कहा कि विज्ञान के लिए हिंदी का समावेशी होना जरूरी है। विज्ञान के शब्दों को लेकर हिंदी में काफी समस्या होती है। उसके शब्द हिंदी में कम मिलते हैं, इसलिए हू-ब-हू हमें उन शब्दों को अपनाने पड़ते हैं।
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