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अमर उजाला चुनाव विमर्श : दशकों बाद भी नहीं मिट सकी जनता के पेट-दिमाग और जेब की भूख

Wed, 22 May 2024 09:47 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

बुधवार को सिविल लाइंस स्थित अमर उजाला कार्यालय में आयोजित चुनाव विमर्श में शहर के साहित्यकारों, कवियों ने मजबूत सरकार के लिए लोकतंत्र के उत्सव में जहां बढ़चढ़कर भागीदारी का आह्वान किया, वहीं ऐसे ही हर मुद्दों, पहलुओं पर विस्तार से आवाज बुलंद की...।
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अमर उजाला चुनाव विमर्श में हिस्सा लेते साहित्यकार। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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चुनावी थाली में वादों के पुलाव सज गए हैं। सबके अपने-अपने जीत-हार के दावे हैं। इसके बीच जनता हर किसी को सुन-गुन रही है। जो भी सरकार आएगी सड़क बनाएगी, अस्पताल, बिजली, पानी जैसे मूलभूत संसाधनों विकास करेगी। लेकिन, इलाहाबाद बहुत दिनों से तरस रहा है सुविधाओं के लिए। लोग हमेशा यही बताते हैं कि जो अयोध्या, वाराणसी आएगा, वह इलाहाबाद जरूर आएगा। लेकिन, यह कब कहा जाएगा कि कोई इलाहाबाद आएगा, वह वाराणसी और अयोध्या भी जाएगा।

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बुधवार को सिविल लाइंस स्थित अमर उजाला कार्यालय में आयोजित चुनाव विमर्श में शहर के साहित्यकारों, कवियों ने मजबूत सरकार के लिए लोकतंत्र के उत्सव में जहां बढ़चढ़कर भागीदारी का आह्वान किया, वहीं ऐसे ही हर मुद्दों, पहलुओं पर विस्तार से आवाज बुलंद की...।चुनावी मुद्दों की यात्रा बहुत लंबी हो चुकी है। 1952 में हुए प्रथम लोकसभा चुनाव के समय जो गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी के मुद्दे उठाए गए थे, वह अब भी उसी तरह मुंह बाए खड़े हैं। पेट, दिमाग और जेब की भूख दशकों बाद अभी तक नहीं मिट सकी है। संगम सूख रहा है, लेकिन गंगा-यमुना के निर्मलीकरण और जल प्रवाह का मुद्दा पूरी तरह गुम हो चुका है।

इस चुनाव में गंगा का तो कोई दल नाम तक नहीं ले रहा है। रही बात मताधिकार की तो ढेर सारे लोगों के नाम मनमर्जी से जोड़े और काटे जा रहे हैं। ऐसे में आधार से लिंक वोटर कार्ड से देश में एक मतदाता सूची की व्यवस्था की जानी चाहिए। गांव खत्म हो रहे हैं। गांव की खासियतें खत्म हो गईं। सच सामने हैं गांव की पगडंडियां खत्म होकर पक्की सड़कों में तब्दील हो गईं। खेत गायब हो रहे हैं। तो हमारे यहां अब छाया देने वाले कट चुके पुराने पेड़ याद आते हैं। जो नदियों, पेड़ों, गांवों के लिए लड़ रहे हैं, हमें इस चुनाव में उनकी आवाज को बुलंद करना चाहिए।

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बहुत सारे मुद्दे काफी समय से चले आ रहे हैं। हम गरीबी के मुद्दे पर वर्षों से लड़ रहे हैं। हम जो विकास कर रहे थे क्या इसमें जल, जंगल जमीन, गांव और नदी को शामिल किया गया? यह सवाल उम्मीदवारों और उनके दलों से पूछा जाना चाहिए। । यह सारे मुद्दे हैं जिनको साहित्य की दुनिया से बुलंद आवाज मिलनी चाहिए। - प्रो. धनंजय चोपड़ा, कोर्स कोआर्डिनेटर मीडिया स्टडीज सेंटर, इविवि।

तुम तटस्थ रहोगे तो मारे जाओगे... महाकवि रामधारी सिंह दिनकर की यह पंक्तियां इस चुनाव के मौके पर बरबस याद आती हैं। मताधिकार का हमें विशेष अधिकार मिला है। अपने मत से हम वह तंत्र चुनने जा रहे हैं जो अगले पांच साल में देश, प्रांत , समाज ही नहीं हर व्यक्ति को दिशा देगा। ऐसे में मताधिकार का प्रयोग एक मजबूत और ताकतवर सरकार चुनने के लिए अवश्य करना चाहिए। -रविनंदन सिंह, संपादक- सरस्वती

बंगीय कवि सुकांत लिखते हैं कि जो बोलेंगे वो मारे जाएंगे...। वहीं उदय प्रकाश लिखते हैं कि- न बोलने पे आदमी मर जाता है...। दरअसल जनतंत्र में जो आम आदमी होता है, उसकी यही नियति होती है। अब चुनाव मुद्दों पर नहीं, जाति-धर्म पर आधारित हो रहा है। इस चुनावी प्रक्रिया को मजबूत,निष्पक्ष और प्रभावी बनाने के लिए निर्वाचन आयोग को एक अनिवार्य चुनाव आचार संहिता बनानी चाहिए। - प्रकाश मिश्र, साहित्यकार।

यह चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण है। सबकी नजर चार जून पर है। ज्यादातर लोगों की जुबान पर तुलसी की चौपाई गूंज रही है- कोउ नृप होई हमै का हानी...। मुद्दा आधारित चुनाव नहीं है। किसी को मुद्दे का पता नहीं है। ऐसे में इस तरह की चुनाव व्यवस्था को लेकर हमें चिंतन-मनन करना चाहिए। - प्रो. अनामिका राय, इविवि
 

आम जनता मतदान के लिए बाहर इसलिए नहीं निकलती है, क्योंकि वह छला हुआ महसूस कर रही है। लोग सवाल करते हैं कि इस मतदान से फायदा क्या होने वाला है। सरकार चाहे किसी की बन जाए, वह अपनी मनमर्जी की ही करेगी। कभी भी कोई सरकार अपने वादों को पूरा नहीं करती है। - इम्तियाज गाजी, संपादक-गुफ्तगू।

वोटरलिस्ट में बहुत खामियां हैं। बिना किसी सर्वे के ही नाम घटाए-बढ़ाए जा रहे हैं। बीएलओ बिना पड़ताल के ही किसी एक व्यक्ति की मनगढ़ंत सूचना पर मतदाता सूची को अपडेट करवा दे रहा है। मेरे पिताजी अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में उनका नाम मतदाता सूची में था। जबकि , माताजी का नाम नहीं था। - कमलकिशोर, छायाकार।

पिछले विधानसभा चुनाव में मुझे मृतक दिखाकर मेरा नाम मतदाता सूची से काट दिया गया। ऐसा सैकड़ों लोगों के साथ हर चुनाव में हो रहा है। मुद्दे चुनाव से गायब हैं। दो तरह की चुनावी घोषणाएं हो रही हैं। एक तो जो घोषणा पत्र जारी किए जा रहे हैं, दूसरी तरफ वो वादे जो रैलियों और सभाओं में किए जा रहे हैं। इसमें बहुत अंतर है। राजनीतिक दलों की नीतियां जनता के प्रति स्पष्ट नहीं है। - प्रवीण शेखर, नाट्य निर्देशक।

हम सबकी जिम्मेदारी है कि अपना खुद वोट देने के साथ ही अपने पास -पड़ोस के हर नागरिक को मतदान के लिए प्रेरित करें, ताकि लोकतंत्र के उत्सव की परिकल्पना साकार हो सके। किसी भी तरह की मतदाता सूची की दिक्कत हो तो उसकी समाधान बीएचओ से मिलकर करा लेना चाहिए। - अनुपम परिहार, कोआर्डिनेटर, स्विप।

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मतदाता सजग हो गया है। राजनीति करवट बदल रही है। धर्म, जाति आधारित मतदान को प्रोत्साहन नहीं दिया जाना चाहिए। हमारी आस्था को ठगा जा रहा है। अविश्वास की भावना बढ़ती जा रही है। लोकतंत्र का इससे भद्दा मजाक कुछ नहीं हो सकता। मताधिकार का इस्तेमाल सबको करना चाहिए, लेकिन जाति-धर्म आधारित नहीं। - अजामिल, साहित्यकार।
 

देश में बहुत कुछ बदला है। पिछले 10 वर्षों में जितना सुधार हुआ है, उतना कभी नहीं हुआ था। ऐसी ही सशक्त और मजबूत सरकार होनी चाहिए। दुनिया में देश का मान बढ़ा है। सीमाएं सुरक्षित हैं। अब क्या चाहिए। गरीबी हटाओ का नारा 1977 में भी दिया गया। अब लोकतंत्र के उत्सव में जब वोट की बात हो रही है तो सबको बढ़ चढ़कर मताधिकार का प्रयोग करना चाहिए। - डॉ. श्लेष गौतम, कवि।
 

बेइमानों के लिए कानून है, लेकिन ईमानदारों के लिए कोई प्रोत्साहन योजना नहीं है। सड़कें सिकुड़ रही हैं, आबादी बढ़ती जा रही है। सरकारें ध्यान नहीं दे रही हैं। मुझे लगता है कि अगला चुनाव नेशनल ट्रैफिक पॉलिसी पर लड़ा जाएगा। देश में सोशल ऑडिट की भी व्यवस्था होनी चाहिए। - डॉ. रणजीत सिंह, लेखक

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