सेल्फ फाइनेंस मोड के पाठ्यक्रमों के संचालन के लिए फैकल्टी से लेकर लैब तक की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी कॉलेजों पर ही होती है। कई कॉलेडों में बीकॉम और बीएससी सेल्फ फाइनेंस मोड में ही चल रहे हैं और इस बार बीकॉम एवं बीएससी भी बड़ी संख्या में सीटें खाली रह गईं हैं। ऐसे में कॉलेजों के लिए सेल्फ फाइनेंस मोड में पाठ्यक्रमों का संचालन कर पाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा।
सीएमपी डिग्री कॉलेज में बीए की 3600 सीटें हैं, जिनमें से दो हजार सीटें अब भी खाली है, जबकि 20 अक्तूबर को स्नातक प्रवेश की अंतिम तिथि है। वहीं, श्याम प्रसाद मुखर्जी महाविद्यालय में बीए की 60 फीसदी से अधिक सीटें खाली पड़ी हैं। वहां भी 20 अक्तूबर तक ही प्रवेश लिए जाने हैं। अन्य कॉलेजों में भी प्रवेश की हालत काफी खराब है।
इविवि के संघटक राजर्षि टंडन महिला महाविद्यालय में बीए की 500 सीटें, बीकॉम की 60 सीटें और पीजी की दो विषयों में 100 सीटें हैं। बीए रेगुलर मोड में है, जबकि बीकाॅम और पीजी का संचालन सेल्फ फाइनेंस मोड में किया जाता है। इन पाठ्यक्रमों में अब तक 20 से 30 फीसदी सीटें ही भर सकीं हैं। कॉलेज की प्राचार्य प्रो. रंजना त्रिपाठी का कहना है कि सीयूईटी और रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता हटाने के बाद भी प्रवेश के लिए अभ्यर्थी नहीं आ रहे हैं।
तकरीबन सभी कॉलेजों में यही स्थिति है। चुनौती सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। इसका असर भविष्य में भी देखने को मिलेगा। आने वाले समय में जब प्रथम वर्ष के विद्यार्थी द्वितीय वर्ष और उसके बाद तृतीय वर्ष में जाएंगे, तब भी स्नातक की सीटें खाली ही रहेंगी और पर्याप्त संख्या में विद्यार्थी उपलब्ध न होने के कारण आर्थिक संकट बना ऱहेगा।