महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर से शुरू होकर सबरीमाला, त्रयंबकेश्वर, पद्मनाभन तक को शामिल करते हुए मंदिरों में महिलाओं के पूजन,अभिषेक पर रोक को लेकर नई बहस छिड़ गई है। दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति बनाने की आर्ट ऑफ लिविंग के श्रीश्री रविशंकर की कोशिशें भी विफल रहीं।
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती सहित कुछेक धर्माचार्यों को छोड़ दें तो नारीवादियों सहित संतों-महंतों का मानना है कि महिलाओं के मंदिर में प्रवेश और पूजन पर रोक अतार्किक, असंगत और अधार्मिक है। बीच बहस जयपुर के इमलीवाला फाटक स्थित शनि मंदिर की महिला पुजारिन सुगनी देवी धर्माचार्यों को आइना दिखा रही हैं। उनसे पहले उनकी नानी और सास भी पूजा कराती थीं।
काशी विश्वनाथ, तिरुपति बालाजी के अतिरिक्त विंध्याचल सहित देश के अन्य सिद्धपीठों में जब महिलाओं के प्रवेश और पूजन पर कोई मनाही नहीं तो फिर देश के किसी भी मंदिर में महिलाओं के पूजन-अभिषेक पर रोक रूढ़िवादिता ही है। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते’ का नारा देने वाले देश में महिलाओं को दोयम दर्जे का मानना महिलाओं ही नहीं सनातन धर्म के साथ भी अधर्म है।
काशी सुमेरू पीठाधीश्वर स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती कहते हैं, हमारे वैदिक ग्रंथों के मुताबिक पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं का स्थान सात गुना अधिक महत्वपूर्ण है। महिलाओं के मंदिर में प्रवेश और पूजा पाठ में कोई मनाही नहीं है लेकिन पुजारी के अलावा मूर्ति का स्पर्श किसी को भी नहीं करना चाहिए।
स्वामी अधोक्षजानंद देवतीर्थ कहते हैं, महिलाओं को पूजा-प्रवेश से रोकना अज्ञानता और वेदों के महत्व को नकारना है। जब भगवान ने गणिका अजामिल, शापित अहिल्या, सदन कसाई जैसे के सारे पापों को परे करके उन्हें अपना बनाया, ऐसे ईश्वर के द्वार पर सभी को बिना शर्त जाने का अधिकार है। समाज बदल रहा है, ऐसे में किसी रूढ़िवादी परंपरा के लिए कोई स्थान नहीं है।
कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम कहते हैं, मंदिरों में महिलाओं के पूजन, प्रवेश से रोक धर्म केनाम पर सबसे बड़ा अधर्म है। पूरी दुनिया में सनातन धर्म ही है, जो शक्ति के रूप मे महिलाओं की उपासना करता है, ऐसे में उन्हें ही पूजा से रोकना बेमानी है। उन्हें पूजा, प्रवेश से रोकने वाले धर्म के मर्म से अनभिज्ञ हैं। सबसे बड़ी बात, जो परंपराएं प्रासंगिक नहीं हैं,उन्हें बंद कर देना चाहिए। सिर्फ परंपरा के नाम पर ढोंग उचित नहीं है।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि कहते हैं, महिलाओं को मंदिरों में पूजन, प्रवेश से रोक पूरी तरह अनुचित है। जब स्वयं शिव, मां पार्वती को रामकथा सुनाते हैं तो फिर महिलाओं को पूजन, प्रवेश से रोकने का कोई औचित्य नहीं है। परिसर या गर्भगृह में जहां तक पुरुषों को जाने का अधिकार है, महिलाओं को भी वहां तक अधिकार मिलना चाहिए।
परी अखाड़े की प्रमुख त्रिकाल भवंता का कहना है कि धर्म के क्षेत्र में लिंग भेद केआधार पर महिलाओं को दोयम दर्जे का मानना उनके साथ अन्याय है। संविधान में जब महिलाओं को समान अधिकार मिले हैं, तो फिर मंदिरों में प्रवेश पर रोक लगाने के पीछे पूर्वाग्रह से ग्रस्त मानसिकता ही है। महिलाओं पर रोक लगाने की बात कहने वाले धर्माचार्यों पर कानूनी कार्रवाई करने की जरूरत है।