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सपने के बोझ तले बिछुड़ गए अपने

Wed, 10 Feb 2016 01:31 AM IST
अविनाशी श्रीवास्तव, अमर उजाला ब्यूरो इलाहाबाद
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तरक्की की तस्वीर देखने में जितनी भली होती है, कई बार उसका फ्रेम उतना ही कमजोर। यह पैमाना उन परिवारों पर ज्यादा सटीक बैठता है, जहां एक या दो ही बच्चे हों। सफलता के फेर में मां-बाप उन्हें दूसरे शहर या विदेश भेज देते हैं लेकिन उनका यही फैसला उनके लिए बाद में दर्द साबित होता है, जब उन्हें बच्चों की जरूरत होती है, लेकिन तब वे किसी और शहर या विदेश में सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहे होते हैं। ऐसे एक दो नहीं सैकड़ों परिवार हैं, जिन्हें सफलता का शूल सता रहा है। इसी तरह बेहतर शिक्षा के फेर में भी माता-पिता अपने बच्चों को किसी अच्छे स्कूल-कालेज के लिए देश या विदेेश में भेज देते हैं, जिससे बच्चे उनसे हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं और बुजुर्ग होने से पहले ही माता-पिता एकाकी हो जाते हैं।
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रिश्तों में प्यार की कमी नहीं है बल्कि, दूरी की वजह से एक-दूसरे के लिए तड़प है। बड़े पद पर रहे और अब पेंशन के साथ फंड के रूप में मिले लाखों रुपये हैं, खुद का मकान है तो बेटा और बहू का कॅरियर माता-पिता से भी कहीं बेहतर है। साथ रहने में धन बाधा नहीं लेकिन उम्र के आखिरी पड़ाव पर आस भरी आंखें बहू-बेटे के इंतजार में टकटकी लगाए बैठी हैं। पूरा जीवन दूसरों का मोहताज बनकर रह गया है। कॅरियर, पीढ़ियों की सोच में अंतर और सांस्कृतिक  अंतर ने माता-पिता को बहू-बेटों से दूर कर दिया है। कइयों का दर्द इतना ही नहीं है। संपत्ति और पैसे की खातिर कोई जान न ले लें इसलिए नौकर रखने तथा अपनों की मदद लेने से भी डरते हैं। उन्होंने खुद को एक अंधेरी कोठरी में कैद कर लिया है।

दून विद्यालय से रिटायर रीता सिन्हा, सरकारी महकमे से ही रिटायर अपने पति के साथ अकेले रहती हैं। उनके दो बेटे हैं। बड़ा बेटा डीआरडीओ-राजस्थान में वैज्ञानिक है तो दूसरा मल्टी नेशनल फर्म में बड़े पद पर है। छोटा बेटा भी दिल्ली में रहता है। रीता का कहना है कि बहुत अकेलापन है। हर पल लगता है कि बच्चे साथ होते तो यह काम कर देते। जब तक काम में व्यस्त रहते हैं, सबकुछ भूला रहता है लेकिन उसके बाद अकेलापन ...। ‘रुंधे गले से बोलीं, तकलीफ होती है तो लगता कि बच्चों से क्या फायदा। जब दूसरों के सहारे ही...।’ रीता कहती हैं, बेटा-बहू बुलाते हैं लेकिन वहां वह आजादी नहीं होती। सबकुछ औपचारिक लगता है। उनके घर पर पोते को खुलकर डाटने में भी एक हिचक सी महसूस होती है लेकिन वही बच्चे अपने यहां होते हैं तो सौ फीसदी अधिकार का बोध होता है। इसके अलावा यहां से एक रिश्ता भी बन गया है। उससे दूर जाना भी आसान नहीं है।
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सीएमपी डिग्री कालेज में शिक्षक रहीं 76 वरस की डॉ.मंदिरा घोष का दर्द कहीं अधिक है। 28 बरस पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे पति डॉ.डीके घोष का निधन हो गया। लाइटिंग डिजाइनिंग आर्टिटेक्ट बेटा सिडनी में रहकर कई देशों में लोगों के जीवन को रोशन कर रहा है तो बेटी दिल्ली में शिक्षक है लेकिन डॉ.मंदिरा 16 साल से बिल्कुल अकेले अंधेरे की धुंध हटाने की जिद्दोजेहद में जुटी हैं। लड़खड़ाई आवाज में डॉ.मंदिरा बताती हैं, ‘पिता और पति यहीं प्रोफेसर रहे। पूरा जीवन यहीं बीत गया। यहां से जुड़ाव हो गया है। इसके अलावा नई जगह पर सामंजस्य बिठाना मुश्किल होता है। वहां जाने पर कुछ दिन तो अच्छा लगता है लेकिन फिर मन नहीं लगता। बचपन से यहीं हूं। पड़ोसी तथा अन्य लोगों की मदद से सब चल रहा है। फिलहाल जब तक अपने दम पर हूं, यहीं रहने का इरादा है।’

बढ़ने लगा है मित्र परिवार का चलन
बड़े शहरों में मित्र परिवार का चलन भी बढ़ने लगा है। हालांकि मुंबई में उपकार सिनेमा हाल में बम विस्फोट के बाद ही इसकी शुरुआत हो गई थी लेकिन अब इसमें बुजुर्गों के समूह की संख्या बढ़ने लगी है। वे इस तरह का परिवार बनाकर एक-दूसरे में अपनत्व और आसरा ढूंढ़ रहे हैं।

‘अलग रहने के पीछे आर्थिक कारण नहीं है। कॅरियर की वजह से बेटा-बहू साथ नहीं रह पाते। इसकी कई वजहें हैं। बच्चे विदेश या बड़े शहरों में हैं तो माता-पिता को वहां कुछ दिन घूमने-फिरने में बिताना अच्छा लगता है लेकिन फिर बोरियत होने लगती है। वहां की संस्कृति भी भिन्न होती है, जिससे तालमेल बिठाना कठिन होता है। खुद के घर पर सबके साथ नाती-पोतों को पालने में आत्मीयता झलकती है लेकिन वही काम जब बेटे या बेटी के घर पर करना होता है तो कुछ दिन बाद ही शिकायत होने लगती है कि बेटे-बहू ने आया बना रखा है। अब तो वृद्धा आश्रम में भी ऐसे लोगों की संख्या बढ़ने लगी है जो पैसा देकर वहां रहते हैं। जहां पैसे की कमी है वहां बच्चेे भी मां-पिता की खुशी के लिए वृद्धा आश्रम में पैसा देकर उन्हें वहीं रख रहे हैं।’
डॉ.हेमलता श्रीवास्तव,
जानी-मानी समाजशास्त्री
‘जीवन के हर पड़ाव के मुताबिक तनाव के अलग-अलग कारण होते हैं। अकेलेपन की वजह से अवसाद की स्थिति बन सकती है। अधिक उम्र में असुरक्षा की भावना भी आ जाती है, जो अवसाद की स्थिति तक पहुंच सकती है। इससे बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में सामाजिक जुड़ाव और अपनेपन की जरूरत होती है।’
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डॉ.वीके सिंह,
अध्यक्ष- मनोचिकित्सा विभाग, मेडिकल कालेज
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