मूलरूप से प्रयागराज के ही हंडिया के रहने वाले तकरीबन साठ वर्षीय महंत नरेंद्र गिरि का बीस वर्ष की उम्र में एक साधु के तौर पर पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी से नाता जुड़ा था। वह हरिद्वार के कुंभ मेले में ही पहली बार महात्मा और फिर अखाड़े की परंपरा के अनुसार नागा संन्यासी बने। इसके बाद वह बतौर सेवादार राजस्थान के खीरम स्थित अखाड़े के आश्रम में रहे।
वर्ष 1998 में हरिद्वार में ही वह अखाड़े के अष्टकौशल में कारबारी यानी उप महंत के रूप चुने गए। फिर वर्ष 2001 में वह अष्टकौशल के श्रीमहंत बने। मठ बाघंबरी गद्दी के महंत भगवान गिरि के नहीं रहने पर उन्हें उनका उत्तराधिकारी घोषित करते हुए वर्ष 2004 में मठ का महंत बनाया गया।
वर्ष 2015 में उज्जैन कुंभ के दौरान अखाड़े की ओर से पहले उन्हें सचिव बनाया गया और फिर उज्जैन कुंभ में ही वह अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष बने।
निरंजनी अखाड़े के हरिद्वार के सचिव महंत रविंद्रपुरी के मुताबिक अखाड़े के चार सचिवों में से महंत नरेंद्र गिरि अखाड़े के प्रयागराज के सचिव थे। प्रयागराज के दूसरे सचिव महंत ओंकार गिरि हैं। वहीं निरंजनी अखाड़े के हरिद्वार के दूसरे सचिव महंत रामरतन गिरि हैं।