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जांच में मनमानी पर हाईकोर्ट सख्त: गवाहों के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने पर विचार करें डीजीपी

Fri, 18 Sep 2026 01:30 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

Allahabad High Court : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों की जांच में पारदर्शिता और निष्पक्षता बढ़ाने के लिए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 180 के तहत गवाहों के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने पर विचार किया जाए। अदालत ने कहा कि इससे जांच में मनमानी की गुंजाइश कम होगी और जमानत समेत अन्य न्यायिक कार्यवाहियों में भी मदद मिलेगी।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों की जांच में पारदर्शिता और निष्पक्षता बढ़ाने के लिए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को गवाहों के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने पर विचार करने को कहा है। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने कहा कि इससे जांच प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय और पारदर्शी होगी। साथ ही अदालतों को जमानत अर्जी और अन्य न्यायिक कार्यवाहियों में भी मदद मिलेगी।

अदालत ने यह आदेश आगरा के बसौनी थाने में दर्ज दहेज हत्या के मामले में चंद्रकांता की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान दिया। सुनवाई के समय विवेचक सहायक पुलिस आयुक्त अनिल कुमार अदालत में मौजूद थे। उन्होंने स्वीकार किया कि प्रथम सूचनाकर्ता का बयान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 180 के तहत दर्ज करते समय उसकी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की गई थी। बाद में विवेचक ने अदालत के समक्ष बिना शर्त माफी भी मांगी।

कई मामलों में बयान लिखने की प्रक्रिया पर उठे सवाल

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 180 की उपधारा (3) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता नियमावली, 2024 के नियम 20(1) के तहत विवेचक को गवाहों के बयान ऑडियो-वीडियो माध्यम से दर्ज करने की अनुमति है। जुलाई 2025 में पुलिस महानिदेशक की ओर से जारी परिपत्र में दुष्कर्म पीड़िता के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य की गई थी, जबकि अन्य मामलों में इसे वैकल्पिक रखा गया था।

अदालत ने कहा कि उसने ऐसे कई मामले देखे हैं, जिनमें विवेचकों ने उपलब्ध सुविधा के बावजूद गवाहों के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की। अदालत के अनुसार, इससे यह आरोप लगने की आशंका रहती है कि बयान विवेचक ने स्वयं तैयार किया है या प्राथमिकी में लिखी बातों को ही बयान के रूप में दर्ज कर दिया गया है। कोर्ट ने इस विकल्प के दुरुपयोग पर भी चिंता जताई।

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पुलिस का काम सजा दिलाना नहीं, निष्पक्ष जांच करना

अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस का उद्देश्य केवल किसी आरोपी को सजा दिलाना नहीं होना चाहिए। पुलिस की जिम्मेदारी निष्पक्ष तरीके से जांच कर वास्तविक तथ्य सामने लाना है, ताकि दोषी तक कानून पहुंचे और निर्दोष व्यक्ति को गलत जांच के कारण परेशानी न उठानी पड़े।

कोर्ट ने इसी उद्देश्य से विवेचकों के लिए कई दिशा-निर्देश भी दिए हैं। इनमें घटना की सूचना मिलने के बाद जल्द मौके पर पहुंचना, उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित करना, आवश्यक मामलों में मोबाइल और विधि-विज्ञान संबंधी साक्ष्य जुटाना तथा जरूरत के अनुसार पहचान की कार्रवाई करना शामिल है।

अदालत ने यह भी कहा कि जिन मामलों में मोबाइल में मौजूद सामग्री, बातचीत या किसी व्यक्ति की स्थिति जांच के लिए महत्वपूर्ण हो, वहां संबंधित डिजिटल साक्ष्य और दूरभाष विवरण का निष्पक्ष तरीके से संकलन किया जाना चाहिए। आपत्तिजनक वीडियो से जुड़े मामलों में भी मोबाइल और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की विधिवत जांच के निर्देश दिए गए हैं।

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दहेज हत्या के मामले में सास को जमानत

चंद्रकांता ने आगरा के बसौनी थाने में दर्ज दहेज से जुड़े मामले में जमानत के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था। अदालत ने प्राथमिकी और धारा 180 के तहत दर्ज बयान में अंतर पाया। साथ ही अदालत ने माना कि आवेदिका के खिलाफ लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं तथा मृतका की मौत से पहले उसके साथ दहेज उत्पीड़न किए जाने के पर्याप्त प्रथमदृष्टया साक्ष्य सामने नहीं आए हैं।

अदालत ने चंद्रकांता का कोई आपराधिक इतिहास नहीं होने और अन्य परिस्थितियों को देखते हुए उसे सशर्त जमानत दे दी। आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को भेजने का भी निर्देश दिया गया है, ताकि जांच संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित किया जा सके।

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