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UP: एलआईसी कर्मियों को हाईकोर्ट से बड़ा झटका, करनी पड़ेगी जनगणना ड्यूटी, अदालत ने खारिज की ये याचिका

Tue, 02 Jun 2026 08:04 AM IST
Sharukh Khan पीटीआई, प्रयागराज

सार

एलआईसी कर्मियों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय से बड़ा झटका लगा है। एलआईसी कर्मियों को जनगणना ड्यूटी करनी पड़ेगी। एलआईसी कर्मचारियों को जनगणना ड्यूटी सौंपने का निर्देश उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा है।
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Allahabad High Court - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एलआईसी कर्मचारियों को जनगणना ड्यूटी सौंपने के निर्देशों को सही ठहराया है। अदालत ने इस संबंध में दायर एक याचिका को खारिज कर दिया। कानपुर मुख्यालय वाले नॉर्थ सेंट्रल जोन इंश्योरेंस इम्प्लॉइज संगठन ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर एलआईसी कर्मचारियों की जनगणना ड्यूटी का विरोध किया था। 
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संगठन का कहना था कि जनगणना अधिनियम में केवल स्थानीय निकायों के कर्मचारियों को ही इस कार्य में लगाया जा सकता है इसलिए एलआईसी कर्मचारियों की नियुक्ति नियमों के खिलाफ है। 

एलआईसी एक वाणिज्यिक प्रतिष्ठान है इसलिए उसके कर्मचारियों की नियुक्ति पूरी तरह कानूनी है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की पीठ ने कर्मचारियों के तर्क को अस्वीकार कर दिया और कहा कि कानून अधिकृत अधिकारियों को ऐसे कर्मचारियों की सेवाएं लेने का अधिकार देता है।
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उच्च न्यायालय ने कहा कि संबंधित प्राधिकरण ने कोई त्रुटि या अवैधता नहीं की है। प्राधिकरण ने अपनी प्रत्यायोजित शक्ति का प्रयोग किया है। एलआईसी कर्मचारियों को जनगणना संचालन के लिए प्रगणक और पर्यवेक्षक के रूप में कार्य करने का निर्देश दिया गया था। 

अदालत ने यह भी कहा कि याचिका में केवल एक अस्पष्ट प्रार्थना थी। इसमें जनगणना कार्य के लिए एलआईसी कर्मचारियों को लगाने के फैसले को रद्द करने की मांग की गई थी। किसी विशेष आदेश को विशिष्ट चुनौती नहीं दी गई थी।

 

याचिकाकर्ता का तर्क
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 4-ए के तहत केवल स्थानीय प्राधिकरणों के कर्मचारियों को ही बुलाया जा सकता है। ये कर्मचारी प्रगणक या पर्यवेक्षक के रूप में जनगणना ड्यूटी कर सकते हैं। 

 

वकील ने आगे कहा कि एलआईसी के कर्मचारी स्थानीय प्राधिकरण की परिभाषा में नहीं आते हैं। सामान्य खंड अधिनियम, 1897 की धारा 3(31) में यह परिभाषा दी गई है। इसलिए, उन्हें जनगणना ड्यूटी सौंपना कानून की नजर में पूरी तरह से अस्थिर है।

 

केंद्र सरकार का प्रतिवाद
दूसरी ओर, केंद्र सरकार के वकील ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 4-ए को अकेले नहीं पढ़ा जा सकता है। इसे अधिनियम की धारा 6(1)(ई) और 7(सी) के साथ मिलकर समझा जाना चाहिए। 

 

ये धाराएं कारखानों, फर्मों और प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों को जनगणना कार्य में लगाने का विशेष रूप से प्रावधान करती हैं। वकील ने जोर देकर कहा कि एलआईसी एक 'वाणिज्यिक प्रतिष्ठान' के दायरे में आता है। इसलिए, जनगणना संचालन के लिए इसके कर्मचारियों को लगाना अधिनियम, 1948 के दायरे में है।

 

न्यायालय का निर्णय
केंद्र सरकार के वकील ने यह भी कहा कि जनगणना नियम, 1990 का नियम 3 अधिकारियों की श्रेणियों को निर्धारित करता है। इन अधिकारियों को जनगणना अधिकारी के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। उनके अनुसार, यह नियम सक्षम प्राधिकरण को उपयुक्त व्यक्तियों को प्रगणक के रूप में नियुक्त करने का व्यापक विवेक देता है। 

 

29 मई को अपने निर्णय में अदालत ने कहा कि कानूनी प्रस्ताव की पृष्ठभूमि में, अधिकृत प्राधिकरण या क्षेत्रीय अधिकारी सक्षम है। वह एलआईसी के साथ कार्यरत व्यक्तियों को प्रगणक या पर्यवेक्षक के रूप में कार्य करने का आदेश जारी कर सकता है।

 

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जनगणना कार्य के लिए नियुक्त कर्मचारी ड्यूटी के दौरान लोक सेवक माने जाएंगे। यदि कोई कर्मचारी आदेश की अवहेलना करता है या कार्य में लापरवाही बरतता है तो उसके खिलाफ जनगणना अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा सकती है। 

 
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अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार की 4 फरवरी 2026 की अधिसूचना का भी उल्लेख किया, जिसके तहत जनगणना-2027 का पहला चरण 22 मई से 20 जून 2026 तक चल रहा है। इस चरण में मकान सूचीकरण और आवास गणना का कार्य कराया जा रहा है।
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