इमरजेंसी में नेताओं की गिरफ्तारी निरस्त कर दी थी
राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी के फैसले की तो आजतक चर्चा होती है पर इसी क्रम में तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति केबी अस्थाना की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने भी ऐतिहासिक फैसला दिया था। देश में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 27 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा कर दी। इस घोषणा के बाद गैर कांग्रेसी प्रतिद्वंद्वी राजनेताओं को मीसा कानून के तहत गिरफ्तार किया जाने लगा।
तब भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने हाईकोर्ट में गुहार लगाई । खंडपीठ ने 6885/1975 नंबर पर उनकी याचिका स्वीकार कर ली। उसी समय वरिष्ठ अधिवक्ता वीरेंद्र कुमार सिंह चौधरी भी सामने आए और याचिका दायर की। रिकार्ड में उनकी याचिका 7428/1975 आज भी दर्ज है। आपातकाल में मीसा कानून के तहत नेताओं की गिरफ्तारी को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी गई । इन दोनों याचिकाओं पर तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति केबी अस्थाना की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सुनवाई शुरू की और अपने ऐतिहासिक फैसले में नेताओं की गिरफ्तारी निरस्त कर दी।
1998 में सांविधानिक संकट टाला
उत्तर प्रदेश में वर्ष 1998 में कल्याण सिंह की भाजपा सरकार थी। तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने 23 फरवरी 1998 को यूपी की कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया और लोकतांत्रिक कांग्रेस दल के नेता जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी। उस वक्त डॉ.. नरेंद्र कुमार सिंह गौर ने राज्यपाल के फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। सुनवाई होने लगी तो न्यायमूर्ति वीरेंद्र दीक्षित व न्यायमूर्ति डीके सेठ की खंडपीठ ने कल्याण सिंह की बर्खास्तगी पर रोक लगा दी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर राज्यपाल चाहें तो कल्याण सिंह को बहुमत साबित करने का आदेश दे सकते हैं। फिर क्या था यूपी में आया सांविधानिक संकट टल गया।
राममंदिर मामले पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 30 सितंबर 2010 को विवादित राम मंदिर मुद्दे पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट ने अयोध्या के विवादित स्थल को रामजन्मभूमि करार देते हुए विवादित जमीन का एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े में बांटने का फैसला दिया था। हाईकोर्ट ने 2.77 एकड़ जमीन का तीन हिस्सों में बंटवारा किया था। इसमें से एक हिस्सा हिंदू महासभा को दिया गया था जिसमें राम मंदिर बनना था, दूसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया था। विवादित स्थल का तीसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को दिया गया था। उच्चतम न्यायालय ने इस पर फैसला देकर विवाद खत्म कर दिया है।
तीन तलाक को असांविधानिक करार दिया
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में तीन तलाक को असांविधानिक करार देते हुए कहा था कि यह प्रथा मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ है। उच्च न्यायालय का यह भी मानना था कि कोई भी पर्सलन लॉ बोर्ड संविधान से ऊपर नहीं है। उच्च न्यायालय के अनुसार संविधान में सबके लिए समान अधिकार हैं और इसमें मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं। न्यायमूर्ति सुनील कुमार ने अपने फैसले में यहां तक कह डाला था कि इस्लामिक कानून तीन तलाक पर गलत व्याख्या कर रहा है। बाद में उच्चतम न्यायालय ने भी तीन तलाक को असांविधानिक घोषित कर दिया।
शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने को लेकर दिखाई गंभीरता
अगस्त 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी ऐतिहासिक टिप्पणी में कहा था कि अधिकारियों, नेताओं और जजों के बच्चों को अनिवार्य रूप से सरकारी स्कूलों में पढ़ाया जाना चाहिए, ताकि सरकारी शिक्षा पद्धति में सुधार लाया जा सके। यह टिप्पणी हाईकोर्ट ने खस्ताहाल प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था पर नाराजगी जाहिर करते हुए दी थी। उच्च न्यायालय ने कहा था कि निगम, अर्ध सरकारी संस्थानों या अन्य कोई भी राज्य के खजाने से वेतन उठा रहा हो, उनके बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ना अनिवार्य किया जाए। इतना ही नहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को आदेश दिया था कि जो कोई इसका पालन नहीं करता उससे फीस वसूली जाए और उनका प्रमोशन और इंक्रीमेंट भी रोक दिया जाए।
जातीय राजनीतिक रैलियों पर लगाई रोक
जुलाई 11, 2013 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति उमानाथ सिंह तथा न्यायमूर्ति महेंद्र दयाल की खंडपीठ ने अपने अहम फैसले में पूरे उत्तर प्रदेश में जातियों के आधार पर होने वाली राजनीतिक दलों की रैलियों पर रोक लगा दी थी। एक ऐतिहासिक फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति पंकज नकवी और न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की खंडपीठ ने दिसंबर 2020 में व्यवस्था दी थी कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर असहमति व्यक्त करना हमारे सांविधानिक और उदार लोकतंत्र की पहचान है। इसी चीज को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत संरक्षित किया गया है। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक व्यक्ति पर दायर एक प्राथमिकी को खारिज करते हुए की।