याचिकाकर्ता ने नियमितीकरण के लिए आवेदन किया लेकिन उच्च शिक्षा निदेशक ने यह दावा करते हुए इंकार कर दिया कि याचिकाकर्ता के पास व्याख्याता की स्थिति के लिए आवश्यक योग्यता नहीं है। यह हवाला देते हुए कि इंटरमीडिएट और स्नातक में व्याख्याता के पद के लिए औसत 55 प्रतिशत या अधिक होना चाहिए।
तर्क दिया कि सरकार ने 30 मार्च 1987 को जारी किए गए आदेश में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता में ढील दी है। पीएचडी पाठ्यक्रम पूरा करने वालों को भी न्यूनतम अंक की आवश्यकता से छूट दी गई है और याची ने 1986 में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। नियमितीकरण के दावे को खारिज किए जाने के बाद याची ने उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने 1997 के शासनादेश के आलोक में उच्च शिक्षा विभाग को याची के प्रत्यावेदन पर निर्णय लेने का निर्देश दिया। इसके बावजूद पहले की तरह ही याचिका के प्रत्यावेदन को खारिज कर दिया गया। याचिकाकर्ता इस दौरान मई 2019 में सेवानिवृत्त हुई। अदालत के अनुसार 1997 के शासनादेश ने स्पष्ट किया कि एमए में 55 प्रतिशत अंक और बीए में 45 प्रतिशत अंक नियमितीकरण के लिए अच्छी शैक्षणिक योग्यता के रूप में माने जाएंगे।
याचिकाकर्ता ने बीए में 45 प्रतिशत से अधिक और एमए में 55 प्रतिशत से अधिक प्राप्त किया है। चूंकि, आवेदक के पास पीएचडी भी है, इसलिए इंटरमीडिएट ग्रेड अप्रासंगिक हैं। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को आदेश दिया कि वह अपने समकक्षों को नियमित करने की तारीख से शुरू होने वाले सेवा नियमितीकरण का लाभ प्रदान करे। साथ ही नियमितीकरण के बाद होने वाले सभी लाभों का भुगतान करे।