इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 25 साल से अलग रह रहे मुस्लिम दंपती के तलाक पर मुहर लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि पक्षकारों की वैवाहिक स्थिति की घोषणा का दावा, समाज के मूल पर प्रहार करता है। इस तरह के निर्विवाद घोषणात्मक दावे के निस्तारण में तकनीकी आधार पर होने वाली देरी से कल्याणकारी कानून की मूल भावना का बलिदान हो जाता है।
यह टिप्पणी कर न्यायमूर्ति विवेक कुमार बिड़ला और न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने झांसी निवासी हसीना बानो की अपील स्वीकार कर ली। कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय की ओर से वैवाहिक स्थिति की घोषणा के दावे को देरी के आधार खारिज करने वाले आदेश को रद्द कर दिया। कहा कि पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा-7 में संलग्न स्पष्टीकरण के तहत पक्षकारों की वैवाहिक स्थिति की घोषणा के लिए मुकदमा या कार्यवाही के लिए कोई सीमा अवधि निर्धारित नहीं की गई है।