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हाईकोर्ट की टिप्पणी : वैवाहिक स्थिति सिद्ध होने में देरी से बलिदान हो जाती है कानून की भावना

Sun, 15 Sep 2024 04:12 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

यह टिप्पणी कर न्यायमूर्ति विवेक कुमार बिड़ला और न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने झांसी निवासी हसीना बानो की अपील स्वीकार कर ली। कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय की ओर से वैवाहिक स्थिति की घोषणा के दावे को देरी के आधार खारिज करने वाले आदेश को रद्द कर दिया।
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अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 25 साल से अलग रह रहे मुस्लिम दंपती के तलाक पर मुहर लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि पक्षकारों की वैवाहिक स्थिति की घोषणा का दावा, समाज के मूल पर प्रहार करता है। इस तरह के निर्विवाद घोषणात्मक दावे के निस्तारण में तकनीकी आधार पर होने वाली देरी से कल्याणकारी कानून की मूल भावना का बलिदान हो जाता है।

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यह टिप्पणी कर न्यायमूर्ति विवेक कुमार बिड़ला और न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने झांसी निवासी हसीना बानो की अपील स्वीकार कर ली। कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय की ओर से वैवाहिक स्थिति की घोषणा के दावे को देरी के आधार खारिज करने वाले आदेश को रद्द कर दिया। कहा कि पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा-7 में संलग्न स्पष्टीकरण के तहत पक्षकारों की वैवाहिक स्थिति की घोषणा के लिए मुकदमा या कार्यवाही के लिए कोई सीमा अवधि निर्धारित नहीं की गई है।

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पारिवारिक न्यायालय के आदेश को किया रद्द

हसीना बानो का निकाह 18 दिसंबर 1984 में हुआ था, इससे उन्हें 1991 बच्चे भी हुए। इसी दौरान आपसी मनमुटाव पैदा हुआ और दोनों अलग रहने लगे। अलग रह रही पत्नी ने पति पर 1990 में भरण पोषण, 1994 में दहेज उत्पीड़न का मुकदमा दाखिल किया। इसके बाद 1999 में आपसी समझौते से दोनों ने अदालत से बाहर तलाक ले लिया। जबकि, हलफनामे पर तलाक की तहरीर 2000 में तैयार की।

करीब 20 साल बाद 2020 में पक्षकारों ने वैवाहिक स्थिति की घोषणा के लिए पारिवारिक न्यायालय में घोषणात्मक वाद दाखिल किया। इसे पारिवारिक न्यायालय ने यह कहते हुए 2023 में खारिज कर दिया कि घोषणात्मक वाद 20 साल की देरी से दाखिल किया गया है। हसीना ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने तलाक की घोषणा के दावे पर मुहर लगा दी और पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना है कि पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा-7 के तहत तलाक की घोषणा के लिए मुकदमा दायर करने की कोई सीमा नहीं है। परिसीमा कानून भी विवाह और तलाक के मामलों पर लागू नहीं होते।
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