विभाग ने 30 मई 73के शासनादेश के आधार पर 15 साल की सेवा होनी चाहिए, लेकिन नौ साल आठ माह छह दिन की सेवा मान पेंशन पाने से वंचित कर दिया, जबकि 1982 के शासनादेश से उसको 10 साल की सेवा पर पेंशन पाने का हक था। उसने साढ़े 14 साल की सेवा पूरी कर ली थी। गलत शासनादेश के आधार पर अधिकार से वंचित किया गया। याची के पति की नियुक्ति करमालीपुर गढ़ी, बागपत, मेरठ के प्राइमरी स्कूल में सहायक अध्यापक के रूप में बिना पद के की गई। 19 नवंबर 63 को अप्रशिक्षित अध्यापक के रूप में नियुक्ति की गई। 30 जून 91 में सेवानिवृत्त हो गया। कुल 34 साल की सेवा की, लेकिन पेंशन का हकदार नहीं माना गया।
हाईकोर्ट ने बीएसए को प्रकरण तय करने का आदेश दिया था। कहा, याची को प्रशिक्षण से छूट नहीं थी। 1973के शासनादेश के आधार पर पेंशन के लिए 15 साल की सेवा जरूरी है। याची की सेवा नौ साल आठ माह छह दिन ही है। कोर्ट ने चार दिसंबर 82 के शासनादेश के आधार पर मेरठ के बीएसए को आदेश पारित करने का निर्देश दिया। इस पर पांच मार्च 8 को पुनः पेंशन का हकदार नहीं माना। 85साल की याची ने पति को पेंशन व उसे पारिवारिक पेंशन का भुगतान करने की मांग में याचिका दायर की। 1982 के शासनादेश से पेशन के लिए 10 साल की सेवा पर्याप्त मानी गई है। बीएसए ने गलत शासनादेश के आधार पर पेंशन देने से इन्कार किया है, आदेश रद्द हो। कोर्ट ने आदेश तो रद्द कर दिया, लेकिन पारिवारिक पेंशन के तौर पर एकमुश्त रकम देने का निर्देश दिया है।