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न्यायपालिका के भीतर रहकर ही होना चाहिए सुधार

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न्यायपालिका के भीतर ही रह कर होना चाहिए सुधार
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हाईकोर्ट के एक सिटिंग जज द्वारा कोलेजिएम सिस्टम और न्यायपालिका की खामियों को उजागर करती प्रधानमंत्री को लिखी गई कथित चिट्ठी पर न्यायपालिका में खासी चर्चा रही। सोशल मीडिया और समाचार पत्रों में प्रचारित इस पत्र में कोलेजिएम सिस्टम से जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता का अभाव और भेदभाव जैसे संगीन आरोप लगाए गए हैं। कहा जा रहा है कि यह पत्र इलाहाबाद हाईकोर्ट के सिटिंग जज रंगनाथ पांडेय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक जुलाई को भेजा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायविदें की राय में कोलेजिएम सिस्टम में सुधार की जरूरत है, न्यायमूर्ति द्वारा उठाए गए सवाल सही हो सकते हैं पर इसे न्यायपालिका के भीतर ही सुधारना होगा। कार्यपालिका के हस्तक्षेप से किसी सुधार की गुंजाइश नहीं दिखाई देती।
बार कौंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन वरिष्ठ अधिवक्ता वीसी मिश्र का कहना है कि कार्यपालिका अपने लिए स्वयं नियुक्तियां करती है तो न्यायपालिका द्वारा स्वयं नियुक्तियां करने में क्या गलत है। कोलेजिएम सिस्टम में जो खामियां हैं, उनको न्यायपालिका द्वारा ही दूर किया जा सकता है। कार्यपालिका के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। जनता का न्यायपालिका पर भरोसा कायम है इसे टूटना नहीं चाहिए। जो प्रश्न प्रधानमंत्री के समक्ष उठाए गए हैं उनको मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उठाना चाहिए था।
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वरिष्ठ अधिवक्ता एनएन त्रिपाठी का कहना है कि ज्यूडिशियल एकाउंबिलिटी बिल सुप्रीमकोर्ट द्वारा खारिज करने के बाद सरकार के पास दूसरा बिल लाने का विकल्प था जो नहीं किया गया। सुप्रीमकोर्ट को जिन बिंदुओं पर आपत्ति थी उसे हटाकर दूसरा बिल लाया जा सकता था। कोलेजिएम की आलोचना तमाम लोग करते हैं। मगर यह आरोप सामान्य प्रकृति के हैं। जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता होनी चाहिए और क्राइटेरिया तय हो यह जरूरी है मगर संविधान की शपथ लेने वाले व्यक्ति का कार्यपालिका के समक्ष इन खामियों को उठाना उचित नहीं है।
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हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश पांडेय का कहना है कि सिस्टम में लंबा समय बिताने और इतने ऊंचे पदों पर रहने वाले लोगों द्वारा न्यायपालिका पर उंगली उठाना इसकी विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करता है। भविष्य में इससे न्यायपालिका को बड़ा सदमा लग सकता है।
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