कोर्ट ने कहा कि लंबित सहायक प्रोफेसर भर्ती प्रक्रिया को केवल उसी आयोग को हस्तांतरित किया जा सकता है जो गठित हो और अस्तित्व में हो लेकिन यह आयोग अभी गठित ही नहीं किया गया है, जिससे कि लंबित भर्ती प्रक्रिया को स्थानांतरित किया जा सके। कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि कोर्ट की कार्यवाही सबसे पवित्र कार्यवाही होती है और किसी भी पक्ष के लिए शपथ या मौखिक रूप से अस्पष्ट या गलत बयान देने की कोई गुंजाइश नहीं होती है।
लोग न्याय की तलाश करते हैं, जो सार्वजनिक धन की कीमत पर दिया जाता है और इसलिए इस तरह की कार्यवाही को किसी पक्ष विशेष को आकस्मिक दृष्टिï से प्रभावित होने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। भले ही वह राज्य ही क्यों न हो। कोर्ट ने कहा कि राज्य ज्यादातर सेवा मामलों में एकमात्र प्रतिस्पर्धी पार्टी है। लिहाजा, यह रवैया स्वीकार योग्य नहीं है।