बेटा तो गया, मुआवजा भी नहीं मिला
0 सलोरी हादसे के सात दिन बाद भी परिजनों को नहीं मिली सहायता राशि
0 विधायक हर्षवर्धन ने भी किया था रुपये दिलाने का वादा, वह भी नहीं लौटे
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद। सलोरी हादसे में अनिकेत एवं शिखर की मौत के बाद मुआवजा देने की घोषणा को सात दिन बीत गए, जबकि प्रशासनिक अधिकारियों ने दुर्घटना के दूसरे दिन दो घंटे के भीतर ही सहायता राशि दिलाने का परिजनों से वादा किया था। बच्चों को गंवाने के बाद अब दोनों परिवार प्रशासनिक अधिकारियों की बेरुखी से हताश हैं। परिजनों का कहना है कि बेटा तो चला गया, लेकिन मदद कहीं से नहीं मिली।
अनिकेत के पिता घनश्याम बताते हैं कि विधायक हर्षवर्धन वाजपेयी ने भी छह लाख रुपये की मदद अलग से दिलाने का भरोसा दिलाया था, लेकिन आज तक कोई लौटकर नहीं आया। इसी तरह शिखर के परिवार तक भी कोई मुआवजा नहीं पहुंचा है। बता दें कि 11 जुलाई को मूसलाधार बारिश में सलोरी के ओमगायत्री नगर मेें विकास विद्यालय की बाउंड्रीवाल अचानक जमींदोज हो गई। पानी के तेज बहाव में बहकर दो बच्चों की मौत हो गई। दुर्घटना का शिकार हुए दोनों बच्चों की पारिवारिक पृष्ठभूमि बेहद कमजोर है। अनिकेत की मां सरिता की मृत्यु कई वर्ष पहले हो चुकी। अनिकेत दो बहन आस्था एवं खुशी के बीच अकेला भाई था। तीनों बच्चों के लालन-पालन के लिए पिता घनश्याम गुप्ता ने कपड़े सिलने की छोटी दुकान खोल रखी है। अनिकेत की मौत ने पूरे परिवार को झकझोर डाला है। सरकार की ओर से मुआवजा मिलने के सवाल पर घनश्याम का कहना है कि 12 जुलाई को उन्हें दो घंटे के भीतर मुआवजा दिलाने का भरोसा अधिकारियों ने दिलाया था। विधायक हषर्वधन वाजपेयी ने भी मदद का भरोसा दिलाया, लेकिन कोई भी मदद नहीं मिली। अनिकेत की तरह शिखर की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी कमजोर है। करीब तीन वर्ष पूर्व उसके पिता जयप्रकाश सिंह की मौत हो चुकी। अब परिवार में मां चंदा और उसकी बहन खुशी बची, लेकिन उस एक मनहूस दिन ने इन दोनों की दुनिया वीरान कर दी। इस परिवार तक भी कोई सरकारी मुआवजे की धनराशि नहीं पहुंची है।
आंसू पोछने नहीं पहुंचा कोई मंत्री
सिस्टम की खामी के चलते दो बच्चों की मौत के बाद पीड़ित परिवार के आंसू पोछने सरकार का कोई मंत्री अभी तक समय नहीं निकाल सका। मेयर अभिलाषा गुप्ता नंदी को भी परिवार को ढांढस बांधने का समय नहीं मिला। यही हाल प्रशासनिक अधिकारियों का भी रहा।
कबड्डी तक उसके साथ खेलती थी...अब बताईये क्या करुं
हादसे के करीब सात दिन बीत चुके हैं, लेकिन शिखर की मां चंदा की आंखें एक पल के लिए भी नहीं सूखीं। पति की मौत के बाद से शिखर ही उसकी जिंदगी का सहारा था। कक्षा दस में पढ़ने वाली शिखर की इकलौती बहन खुशी किसी तरह मां को संभालने की कोशिश करती है, लेकिन संभालते-संभालते खुद भी रोने लगती है। उनके घर की छत से विकास स्कूल की वह बाउंड्रीवाल दिखती है। उसकी मां इस स्कूल की एक-एक ईंट अपने हाथ से उखाड़ देना चाहती है। शिखर को याद करते हुए मां चंदा कहती है, सारा दिन शिखर से शुरू होकर उसी पर खत्म होता था। वह बाहर न जाए इसलिए कोई ऐसा खेल नहीं, जिसे उसके साथ खेला न हो। कबड्डी तक उसके साथ खेली है, लेकिन अब बताइए क्या करूं?