नगर निगम के डूडा में पंजीकृत 13800 पटरी के दुकानदार मुख्यमंत्री की ओर से घोषित आर्थिक सहायता से वंचित हैं। सर्वे के नाम पर खानापूरी करने वाली कंपनी ने स्ट्रीट वेंडरों के नाम आधार और बैंक एकाउंट से लिंक नहीं किए। खामियाजा रोज कमाने खाने वाले भुगत रहे हैं।
लॉक डाउन में सड़क किनारे ठेला खोमचा लगाकर जीवकोपार्जन करने वाले स्ट्रीट वेंडर भुगत रहे हैं। काम धंधा बंद होने से लाल पर्ची धारक पंजीकृत वेंडरों के परिवार भुखमरी के कगार पर हैं। करीब दो साल पूरे होने को हैं, पटरी के दुकानदारों को दुकानें मिलना तो दूर वेंडिंग जोन का निर्धारण भी अटका है।
जानकारी के मुताबिक सर्वे पूरा कर डूडा को 13800 स्ट्रीट वेंडरों की सूची देने वाली कंपनी ने दुकानदारों के आधार और बैंक खातों को लिंक नहीं किया। अब आर्थिक सहायता अटकी तो हो-हल्ला मचा। बताते हैं कि इस माह के दस दिनों में करीब 2356 स्ट्रीट वेंडरों की सूची खातों और आधार से लिंक कर लखनऊ भेजी गई है। करीब पांच सौ लोगों के खाते में आर्थिक सहायता सीधे खातों में पहुंचने का दावा किया जा रहा है, जिसे लाभार्थी पुष्ट नहीं कर रहे हैं।
आजाद हाकर स्ट्रीट वेंडर यूनियन के प्रदेश महामंत्री और टाउन वेंडिंग कमेटी के सदस्य रवि द्विवेदी का कहना है कि सर्वे करने वाली कंपनी ने घालमेल किया है। शहर में 20 हजार से अधिक पटरी के दुकानदार हैं, अधिकतर का नाम दर्ज ही नहीं है। उन्होंने बताया कि यूनियन की ओर से पांच हजार पटरी के दुकानदारों की सूची नगर आयुक्त को दी गई है, जिनकी लाल पर्ची बनी ही नहीं हैं। ऐसे में अधिकतर स्ट्रीट वेंडर आर्थिक सहायता से वंचित हो सकते हैं।
नगर निगम कार्यकारिणी के पूर्व उपाध्यक्ष रतन दीक्षित ने नगर आयुक्त से कहा कि सर्वे में खामियां साफ दिख रही हैं। इस कार्य में लगी कंपनी को काली सूची में डालें। पटरी के दुकानदारों को सर्वे कराकर आधार और बैंक एकाउंट की फीडिंग कराएं तो जरूरतमंद पटरी के दुकानदारों को आर्थिक सहायता मिल सके।