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अखाड़ा बनाकर घर लौटे हैं किन्नर

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अखाड़ा बनाकर घर लौटे हैं किन्नर
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0 अर्द्धकुंभ मेले में लगेगा शिविर, होंगे धार्मिक-सांस्कृतिक अनुष्ठान
0 किन्नर तो साक्षात परमात्मा का स्वरूप, संन्यासी बनना जरूरी नहीं
अनिल सिद्धार्थ
इलाहाबाद।
इतिहास गवाह है कि धर्म की रक्षा के लिए किन्नरों के कंधे पर रखकर धर्मयुद्ध लड़े गए। सो हमारी जो अपनी असली जगह है, हम वहीं लौटे हैं। किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने कहा है कि किन्नर अखाडे़ की स्थापना का उद्देश्य अखाड़ा परिषद या किसी अखाड़े के महत्व को कम करना नहीं बल्कि किन्नर समाज को उसके मूल घर से परिचित कराना है।
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अलोपीबाग स्थित शंकराचार्य आश्रम में आयोजित अखाड़े के तीसरे स्थापना दिवस पर ‘अमर उजाला’ से मुलाकात में उन्होंने कहा, किन्नर तो परमात्मा का स्वरूप हैं, उन्हें परमात्मा को पाने के लिए संन्यास लेने या अन्य कोई जतन करने की जरूरत नहीं है। भगवान शिव ने स्वयं अर्धनारीश्वर का रूप धरा था। हमें कोई मान्यता और सम्मान दे या न दे। हम किसी का तिरस्कार नहीं करते सिर्फ प्यार बांटते हैं। जहां तक तिरस्कार की बात है तो हमसे ज्यादा इस शब्द से भला कौन परिचित है। बचपन से लेकर बड़े होने तक और परिवार से लेकर समाज तक हमें सिर्फ और सिर्फ तिरस्कार ही मिला। हम तो प्रेम, सम्मान और आदरपूर्वक सभी को अपने कार्यक्रमों में निमंत्रित करते हैं। अब यह उनका विवेक है कि वह आएं या न आएं। जिन्हें हम दुआ देते हैं, उनसे क्या मांगेंगे, उनका क्या छीनेंगे। बस, हमें हमारी जगह दे दो। किन्नर अखाडे़ में बिना भेदभाव सभी का स्वागत है। फिलहाल, अर्द्धकुंभ मेले की तैयारी है। हम अपना शिविर लगाएंगे और अनेक धार्मिक-सांस्कृतिक अनुष्ठान करेंगे।
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