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जब डाकू मानसिंह से हुई मुलाकात

Fri, 20 Jul 2018 03:01 AM IST
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
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gopal das neeraj
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बहुत पुरानी बात है जब शायद पचपन-छप्पन की उम्र रही होगी। तब मैं कालेज में काम करता था। डीएस कॉलेज में लेक्चरर के रूप में नया-नया प्रवेश किया था। उन्हीं दिनों में मुझे भिंड के एक कवि सम्मेलन में बुलाया गया था। वहां जाने के लिए मैंने आयोजकों से यह शर्त रखी कि आप मुझे रात में एक बजे मुक्त कर देंगे। ताकि मैं इटावा से अपर इंडिया पकड़कर समय से कॉलेज पहुंच सकूं। आयोजकों ने यह बात मान ली। कार्यक्रम के बाद रात में 300 रुपये देकर मुझसे कहा गया कि जीप खड़ी है, इसमें आप बैठ जाइए। यह जीप आपको इटावा पहुंचा देगी। उन दिनों भिंड-मुरैना क्षेत्र में डाकू मानसिंह व लाखन सिंह का बहुत आतंक था। मान सिंह का गांव-गांव में बहुत आदर था। जबकि लाखन सिंह से लोग नफरत करते थे। जो जीप उन्होंने मेरे लिए मंगाई थी, मैं उसमें बैठ गया। 
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उन्होंने ड्राइवर से कहा कि गाड़ी चलाओ और इन्हें इटावा पहुंचा दो। ड्राइवर निंदासा सा था। पानी-वानी से उसने मुंह धोया और गाड़ी लेकर चल दिया। जनवरी का महीना था। सर्दी की रात थी। थाना भूप से एक दो मील पीछे गाड़ी अचानक रुक गई। मैने ड्राइवर से पूछा कि क्या बात है। क्या कोई खराबी-वराबी आ गई है। वह बोला हुजूर गलती हो गई, गाड़ी में डीजल खत्म हो गया। यह सुनकर मेरे बदन का खून जमने लगा।

अंधेरी रात, दोनों गाड़ी में। समझ ही ना आए कि अब क्या करें, क्या न करें। थोड़ी देर में आवाज में बोले जीप में कौन है। बाहर आओ। उस भयंकर रात में डरे-डरे पसीने-पसीने हम दोनों बाहर आ गए। घिग्घी बंधी हुई थी हमारी। उन्होंने पूछा कौन हो, कहां से आ रहे हो। मैंने डरते-डरते बताया भैया हम तो यहां मेले में कविता पाठ करने आए थे।
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उन्होंने पूछा क्यों खडे़ हो। हमने बताया कि डीजल खत्म हो गया है। उनमें से एक ने कहा तो आप कवि जी हैं। चलिए कक्कू के पास चलिए, आपको वहां ले चलते हैं। कहीं आप खुफिया पुलिस तो नहीं हैं। हमारे आगे-पीछे एक-एक डाकू और बीच में हम दोनों। मेड़ों-मेड़ों पर चलते काफी देर बाद एक गांव में पहुंचे। वहां बरामदे में एक दीया जल रहा था। पैरों की आहट सुनकर अंदर से पूछा गया कौन। डाकुओं ने सांकेतिक भाषा में उत्तर दिया। आवाज आई आ जाओ, दरवाजा खुला है। वह हमें अंदर लेकर गए। अंदर जाकर देखा कि एक चारपाई पर एक बूढ़ा आदमी रजाई ओढ़े पलंग पर बैठा था।

माथे पर तिलक, बगल में रायफल। वह डाकू मानसिंह था। उस बूढ़े आदमी का मुखमंडल देखकर मैं सचमुच प्रभावित हुआ। लंबा चेहरा, छोटे-छोटे बालों से देखने में वह कहीं से भी डाकू नहीं लगते थे। संत जैसे लगे एकदम। मैंने उनके पैर छुए। उन्होंने पूछा कौन हो तुम। मैंने बताया कि कविता पाठ करने आया था। बोले आप ग्रंथी जी हैं। मैंने कहा आप यही समझ लीजिए। बोले कोई भजन सुनाइए। मैंने टूटे-फूटे स्वर में उन्हें सूर व मीरा के भजन सुनाए। मैंने देखा कि भजन सुनते समय उस बूढ़े आदमी की आंखों से आंसू बह रहे थे। भजन सुनकर उन्होंने अपनी मुट्ठी टटोलकर मेरे हाथ में 100 रुपये रखे। बोले अभी मेरे पास आपको भेंट देने के लिए यही है। 
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