मेरठ के मखदूमपुर, बुलंदशहर के आहर, अलीगढ़ के किरतौली, कासगंज के इस्माइलपुर और शाहजहांपुर के गोरा में इन-सीटू कछुआ हेचरी बनाई गईं हैं। इनमें से मेरठ, बुलंदशहर, अलीगढ़ और कासगंज की हेचरी गंगा तट के किनारे हैं। शाहजहांपुर की हेचरी रामगंगा नदी के तट पर है। इन हेचरियों में 338 घोंसले बनाए गए हैं। इनमें कछुओं को वैज्ञानिक विधि से संरक्षित रखा जाता है।
मई के अंतिम सप्ताह में बाहर निकलेंगे कुछए
मई के अंतिम सप्ताह में कुछए हेचरी से बाहर आएंगे। इनको एक्स-सीटू कछुआ संरक्षण केंद्र में रखा जाएगा। कुछ दिनों तक यहां रखने के बाद बारिश के बाद इनको गंगा में छोड़ा जाएगा।
गंगा मित्र कर रहे हैं मदद
कछुओं के संरक्षण में स्थानीय ग्रामीण मदद कर रहे रहे हैं, इन्हें गंगा मित्र नाम दिया गया है। गंगा मित्र अंडों को खोजने, निगरानी और संरक्षण में सहायता करते हैं।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ और उत्तर प्रदेश वन विभाग ने मिलकर अब तक गंगा और रामगंगा में दस हजार से अधिक कछुए छोड़े हैं। इनमें दुर्लभ प्रजाति की थ्री-स्ट्रिप्ड रूफ्ड टर्टल भी शामिल है। गंगा मित्रों के सहयोग से यह संभव हुआ है।-डॉ. हरि मोहन, एसोसिएट कॉर्डिनेटर डब्ल्यूडब्ल्यूएफ।
अलीगढ़ के गांव किरतौली में कछुआ संरक्षण केंद्र 2022 में खोला गया था। अब तक करीब 2500 कछुए गंगा में छोड़े जा चुके हैं। हेचरी में चार सौ अंडे संरक्षित हैं। इनमें से बच्चे निकलने के बाद उन्हें संरक्षण केंद्र में रखा जाएगा। - नवीन प्रकाश शाक्य, डीएफओ, अलीगढ़।