हेमलता त्रिवेदी तो गांधी जी के आह्वान पर 1942 के आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। अंग्रेजों ने इन्हें गिरफ्तार कर दिया। उनकी गोद में नन्हीं बच्ची थी। उसे भी मां के साथ जेल में रहना पड़ा था। छेदालाल मूढ़ जी ब्रजभाषा के जनकवि थे और क्रांतिकारी थे। सावित्री देवी मूढ़ जी की पत्नी थीं। अंग्रेजों की नजरों से छुपकर लोकगीतों के जरिए मूढ़ जी आजादी की अलख जगा रहे थे। उनका पता लगाने के लिए फिरंगियों ने सावित्री देवी को भीषण यातनाएं दीं। उन्हें डंडों और हंटरों से पीटते थे। इस वीर महिला ने उफ तक नहीं की। मूढ़ जी और साथियों का पता नहीं बताया।
यातनाओं से मात्र 37 साल की उम्र में 1936 में उनका निधन हो गया। गंगा देवी ने आजादी के मतवालों के प्रभाव में विदेशी सामानों की होली जलाने, विदेशी शासन के खिलाफ जुलूस निकालने में सक्रिय भूमिका अदा की। इन्हें 1942 में अंग्रेजी सरकार ने नजरबंद कर दिया था। महान स्वतंत्रता सेनानी कुंवर नेत्रपाल की पत्नी कस्तूरी देवी पति के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए जंग-ए-आजादी में भरपूर योगदान दिया। गोद में बालक लेकरउन्होंने 9 अगस्त को अलीगढ़ के सुदामापुरी इलाके में विदेशी कपड़ों की होली जलाई। उन्हें अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया।
अंग्रेजी फौज से लोहा लेने के लिए धुरी राष्ट्रों की सेना में शामिल इगलास के सोवरन सिंह का बरसों अता-पात नहीं था। उनकी पत्नी सुशीला देवी ने कई साल विधवा जैसा जीवन बिताया। उनकी स्थिति पागलों जैसी हो गई थी। इसी हालत में वह बड़बड़ातीं कि भारत एक न एक दिन जरूर आजाद होगा। 1947 में आजादी मिलने पर सोवरन सिंह चमत्कारिक रूप से घर पहुंचे।
ढोल-नगाड़ों के साथ उनका स्वागत किया गया। इसके बाद सुशीला देवी सामान्य हो पाईं। कृष्णा दुलारी देवी की ख्याति गांधी के अनन्य अनुयाइयों में की जाती है। गांधी के प्रभाव में वह जबतब मौन व्रत धारण कर लेतीं। एक बार मौन व्रत के दौरान उनके कपड़ों में आग लग गई। व्रत की वजह से उन्होंने आवाज नहीं लगाई। इससे वह 30 फीसदी तक जल गई थीं।