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फिर से भूकंप की हलचल

Mon, 11 Apr 2016 01:41 AM IST
अलीगढ़/ब्यूरो
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 अलीगढ़ में रविवार शाम 4 बज कर एक मिनट पर भूकंप के बेहद मामूली झटके महसूस किये गए। जिससे कुछ जगहों पर लोग घरों से बाहर निकल आये तो कुछ जगहों पर कामकाज रूक गया।
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कुछ ही लोग इसका अहसास कर सके। अधिकांश लोगों को इसकी जानकारी बाद में खबरों और मोबाइल पर चले एसएमएस या सोशल मीडिया के संदेशों से हुआ। हां, लोगों में भूकंप को लेकर चिंता जरूर बढ़ गई है। अलीगढ़ में कहीं भी रिक्टर स्केल नहीं होने से इसकी तीव्रता नहीं नापी गई है लेकिन भूकंप के केंद्र अफगानिस्तान के हिंदुकश में इसकी तीव्रता 6 तक रही है। अलीगढ़ में इससे पहले भी लगातार भूकंप के झटके लग रहे हैं।
रेडियो फ्रीक्वेंसी और अर्थ क्विक एंटिना दे सकता है भूकंप से बड़ी राहत
अलीगढ़। डीएस डिग्री कालेज के भौतिक  विज्ञान विभाग के पूर्व प्रोफेसर और सिंघानिया यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति डा. आर स्वरूप ने बताया कि जिस तरह से किसी बहुमंजिला इमारत को आसमानी बिजली से बचने के लिए अर्थ एंटिना लगाया जाता है और ये अर्थ एंटिना पूरी इमारत पर गिरने वाली बिजली को जमीन के अंदर समाहित कर इमारत को बचा लेता है। उसी तरह से भूकंप प्रभावित इलाकों में अर्थ क्विक एंटिना लगाये जा सकते हैं।
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ये एंटिना भूकंप की तीव्रता को जमीन से कई सौ फीट ऊपर ले जाकर उसे निष्प्रभावी कर सकते हैं। इस तकनीकी पर काम हो तो अर्थ क्विक के कंपन से निकलने वाली ऊर्जा का सदुपयोग भी हो सकता है। यही नहीं रेडियो फ्रीक्वेंसी तकनीकी का इस्तेमाल कर भूकंप की सटीक जानकारी भी दे सकते हैं।
क्योंकि रेडियो फ्रीक्वेंसी की तरंगे जमीन के आरपार निकल सकती है। इससे जमीन की जिस सतह पर भूकंप की संभावना ज्यादा हो उसका पता लगाया जा सकता है। जमीन के अंदर की टैक्टोनिक प्लेट में क्या बदलाव हो रहा है..? इसकी जानकारी भी हो सकती है। हकीकत में अर्थ क्विक और डिजास्टर मैनेजमेंट के लिए जिम्मेदार विभागों की टीमें कुछ नहीं कर रही हैं। ये केवल भूकंप आने के बाद ही कहती हैं कि ये दैवी आपदा है, इसका पूर्वानुमान नहीं हो सकता है।
लेकिन ये कहना पूरी तरह से सही नहीं है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर हुई उच्च स्तरीय बैठक में भूकंप और जल संकट पर मंथन भी हुआ है। लेकिन बेहद अफसोसजनक बात ये है कि प्रधानमंत्री की संजीदगी और गंभीरता के बाद भी वैज्ञानिकों द्वारा दिए गए प्रस्तावों पर क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है क्योंकि नई दिल्ली में कई विभागों के अफसरों को शायद नये प्रस्ताव समझ नहीं आते हैं।
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