चार वर्ष के कड़े संघर्ष के बाद आखिरकार पाकिस्तान के बलूचिस्तान निवासी 61 वर्षीय लाजवंती पत्नी रमेशलाल को आखिरकार भारत की नागरिकता मिल ही गई। बुधवार को डीएम चंद्रभूषण सिंह ने उन्हें भारत की नागरिकता संबंधी प्रमाणपत्र सौंपा। हालांकि हाथरस अड्डा मदार गेट पर जनरल स्टोर की दुकान चलाने वाले उनके पति, बेटे एवं बेटी को अभी भी नागरिकता का इंतजार है। लाजवंती आजादी के 72 वर्षों बाद भारत की नागरिकता पाने वाली अलीगढ़ की दूसरी नागरिक हैं। इनसे पहले फिरदौस नगर हमानियां मस्जिद के पास सिविल लाइन निवासी शब्बीर हुसैन पुत्र हुसैनी खां को आठ अक्तूबर 2015 को भारत की नागरिकता मिली थी।
अराजकता से घबराकर आए थे भारत
पश्चिमी पाकिस्तान के बलूचिस्तान में वर्ष 1953 में जन्मे लाजवंती के पति व वर्तमान में नई बस्ती थाना बन्नादेवी निवासी रमेशलाल ने बताया कि उनकी पत्नी लाजवंती पाकिस्तान के सिंध इलाके की हैं। उनका विवाह वर्ष 1972 में हुआ था। वहां भी वह किराना की दुकान चलाते थे। उस समय बलूचिस्तान में अराजकता का माहौल था। वर्ष 2005 में वहां के नवाब की हत्या के बाद रोजाना बमबारी और अराजकता से घबराकर उन्होंने वर्ष 1968 से अलीगढ़ में रह कर किराना का काम करने वाले अपने भाई बच्चाराम से संपर्क किया और उन्हीं की प्रेरणा से अलीगढ़ आ गए। यहां उन्होंने हाथरस अड्डे मदार गेट जैन मंदिर के पास पूजा जनरल स्टोर के नाम से दुकान खोली जो आज भी जोर शोर से चल रही है।
रमेशलाल ने बताया कि पाकिस्तानी नागरिक होने के नाते
वह और उनका परिवार एलटीवी यानि लांग टर्म वीजा के जरिये अलीगढ़ में रह रहा था। हर साल 100 रुपये सालाना फीस जमा कराकर उनकी एलटीवी जारी होती थी। इसके लिए उन्हें एसएसपी के पास अपना पासपोर्ट समेत अन्य कागजात लेकर जाना पड़ता था। एसएसपी के यहां से उनकी एलटीवी बढ़ाने की अर्जी शासन को जाती थी। वहां से केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास।
मोदी की घोषणा के बाद बढ़ी रफ्तार
रमेशलाल ने बताया कि उन्होंने अपना, पत्नी लाजवंती, पुत्र कैलाश, बेटी पूजा की नागरिकता के लिए वर्ष 2015 में आवेदन किया था। वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारत में लंबे समय से रह रहे पाकिस्तानी एवं बांग्लादेश के लोगों को भारत की नागरिकता देने के आदेश के बाद नागरिकता आवेदनों ने गति पकड़ी। तब से वह और उनका परिवार लखनऊ और दिल्ली के चक्कर काट रहा थे।
एक बेटा एवं बहू भी कतार में रमेशलाल का एक बेटा हरेशलाल वर्तमान में बलूचिस्तान में ही रह रहा है। जबकि एक अन्य बेटा शंकरलाल एवं बहू वर्जनाबाई वर्ष 2013 में अलीगढ़ आ गए हैं। उन्होंने भी नागरिकता के लिए आवेदन किया है।