ओएलएफ (अवर लेडी ऑफ फातिमा) स्कूल की संस्थापक सदस्यों में शामिल और पहली प्रिंसिपल सिस्टर स्टेंसलॉस (86) का जीवन न्याय, सत्य, प्रेम और सेवा भाव से भरा रहा है। उनके जाने से परिसर ही नहीं, समाज में भी सूनापन हो गया है। ये बातें सोमवार को सिस्टर स्टेंसलॉस के अंतिम संस्कार से पहले प्रार्थना सभा में आगरा से आए आर्कबिशप अल्बर्ट डिसूजा ने कहीं।
उन्होंने कहा कि राजा हो या रंक, सभी ईश्वर का लिखा जीवन जीते हैं। ईश्वर ही जीवन की बागडोर संभालता है। कुछ सिस्टर आंसू बहा रही हैं। लेकिन सभी को ज्ञात होना चाहिए कि सिस्टर स्टेंसलॉस ने अपने चेहरे पर कभी उदासी नहीं आने दीं। उनके शिष्य उनसे प्रेरणा लेकर एक बेहतर जीवन यापन करें और समाज के लिए कार्य करें। दूसरों को खुशी देना ही जीवन का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए। संस्थान की रजत जयंती का एक संस्मरण सुनाते हुए उन्होंने कहा कि उस समय सभी सिस्टर स्टेंसलॉस को घेरे हुए थे। किसी का ध्यान रजत जयंती पर नहीं था। वह इतनी सादगी और प्रेम से भरी हुई थीं कि कोई उनसे दूर नहीं रहना चाहता था। प्रार्थना सभा के बाद रीति-रिवाज के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। विद्यालय परिसर में ही उनके पार्थिव शरीर को दफनाया गया। इस दौरान कैथोलिक समाज के साथ-साथ अन्य समाज के लोगों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।
ये लोग मुख्य रूप से रहे मौजूद
सिस्टर स्टेंसलॉस के भाई फादर जॉन व सिस्टर सबीना के साथ एएमयू कुलपति प्रो. तारिक मंसूर, पूर्व एमएलसी विवेक बंसल, फादर सन्नी कोटूर, फादर मून, फादर अकरा, फादर जॉर्ज पॉल, सिस्टर स्टेंसलॉस के साथ विद्यालय की शुरुआत में साथ रहीं आरती गुप्ता, केसी, प्रीति, प्रभा हांडा, सिस्टर रंजना, प्रिंसिपल सिस्टर ज्योत्सना, सिस्टर शुचिता, सिस्टर इस्प्रिया, सिस्टर डोरिश, शालिनी, किरन के साथ मदर जनरल रोशन की उपस्थिति रही। इनके अलावा उनके शिष्य, कैथोलिक समाज, स्टूडेंट, डॉक्टर, प्रोफेसर आदि मौजूद रहे।
सिस्टर को अलीगढ़ से हो गया था प्यार
अलीगढ़। ओएलएफ की स्थापना और विद्यालय को सीबीएसई की मान्यता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली सिस्टर स्टेंसलॉस को अलीगढ़ शहर से प्यार हो गया था। यही वजह है कि सेवानिवृत्ति के बाद वह अपने गांव नहीं गईं और अलीगढ़ में ही बस गईं। हमेशा से उनकी यही इच्छा रही कि वह कभी अलीगढ़ से बाहर नहीं जाएं। उनकी इच्छा के अनुरूप ही विद्यालय परिसर में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया। प्रो. तारिक मंसूर और प्रिंसिपल सिस्टर ज्योत्सना ने कहा कि वह इतनी प्रिय महिला रही हैं कि उनके जाने से भारी क्षति हुई है। वह सभी से प्यार तो करती ही थीं, सभी के परिवार के सदस्यों को नाम से जानती भी थीं।
एक दिसंबर 1955 को ली थी धार्मिक जीवन की शपथ
केरल के त्रिशुर जिले के ओल्लुर नगर में सिस्टर स्टेंसलॉस का जन्म 22 अगस्त 1934 को हुआ था। उस समय उनका नाम थ्रेसिया मालीकल रखा गया। वह 11 भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं। बचपन से ही कैथोलिक वातावरण मिलने से उनमें धर्म पारायण का भाव आ गया था। उनके पिता फादर जॉन मालीकाल सोसाइटी ऑफ दि डिवाइन वर्ड में पुजारी थे। थ्रेसिया को यकीन हो गया था कि उनका जन्म दूसरे लोगों के लिए हुआ है। इसलिए उत्तर भारत में सेवा करने का मन बना लिया। धार्मिक जीवन की शपथ एक दिसंबर 1955 को ली। इसके बाद जब उन्हें ओएलएफ स्कूल की स्थापना की जिम्मेदारी मिली तो उन्होंने चार कमरे किराए पर लेकर कक्षाएं शुरू कीं। 1967 में वह पहली प्रिंसिपल बनीं। 1972 में हायर सेकेंडरी के 13 विद्यार्थियों के बैच ने बेहतर रिजल्ट दिया। इस बैच में प्रो. तारिक मंसूर भी थे। इसके बाद ओएलएफ स्कूल का सफर शुरू हुआ जो आज एक वट वृक्ष के समान है। यहां से पढ़कर निकले कई विद्यार्थियों ने देश ही नहीं विदेशों में भी विद्यालय का नाम रोशन किया है। उनके जाने से उनके शिष्य, परिजन, विभिन्न शिक्षण संस्थानों के फादर, सिस्टर, हेड मिस्ट्रेस आदि दुखी हैं।
ओएलएफ में सिस्टर स्टेंसलॉस को श्रद्धांजलि देने के लिये पहुचीं शिक्षिकाएं।- फोटो : CITY OFFICE