हजारों किलोमीटर की दूरी कुछ ही मिनटों में तय कर दुश्मनों को नेस्तनाबूद कर देने वाली मिसाइलों के कु छ बेहद छोटे पुर्जे अलीगढ़ में भी बनते हैं, जिनका इस्तेमाल मिसाइलों को शुरुआती गति देने के लिए किया जाता है। तालानगरी और आगरा रोड की दो फैक्ट्रियों में इनका निर्माण खास आर्डर पर होता है। हैदराबाद और नागपुर की कुछ कंपनियों के आर्डर पर इनको बनाया जाता है। हैदराबाद और नागपुर की कंपनियों के माध्यम से इनकी सप्लाई रक्षा क्षेत्र से जुड़ी सरकारी एजेंसियों को दी जाती है।
वर्ष 1990 में स्थापित हुई डीप एक्सप्लोसिव इक्विपमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड के संचालक तरुण सक्सेना और ललेश सक्सेना इस बेहद रोमांचक कारोबार में हैं। दोनों भाइयों को उम्मीद है डिफेंस इन्फ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर में अलीगढ़ को शामिल करने से यहां रक्षा क्षेत्र से जुड़ी सामग्री का निर्माण बड़ी तादाद में हो सकेगा। तरुण ने बताया कि 28 साल के लंबे सफर में उन्होंने कई मशीनों का निर्माण किया है, जो अब देश विदेश में सफलता से काम कर रही हैं। वर्तमान में वह बेहद खतरनाक विस्फोटक जिलेटिन को पैक करने की एल्यूमिनियम क्लिप मशीन, डाइनामाइट ब्लास्ट करने वाले डेटोनेटर का लोहे का खोल, खतरनाक विस्फोटकों के मिश्रण को एक खास वातावरण और तापमान में मिलाने वाली बड़ी मशीनें बनाते हैं। इसके अलावा स्मोक गैस और टियर गैस के कैप्सूल का एल्यूमिनियम खोल बनाते हैं। इससे पहले उन्होंने देश की चर्चित बोफोर्स तोप के गोले दगाने वाला स्ट्राइक कैप भी बनाया है।
आईएसओ की तर्ज पर अंतरराष्ट्रीय स्तर की क्रिस्टल रेटिंग में तरुण की कंपनी फाइव स्टार से लैस है। उन्होंनेे बताया कि वह अलग-अलग तरह की खास पैकिंग में इस्तेमाल होने वाली एल्यूमिनियम पैकिंग क्लिप की मशीन डीसीएम भी बना चुके हैं। जिसे कंपनी के नाम पर डीप क्लिपिंग मशीन यानी डीसीएम कहते हैं। इसके वन, टू और थ्री, तीन मॉडल हैं। इसकी सप्लाई नाइजीरिया, सऊदी अरब, मलेशिया, कोरिया और वियतनाम में हुई है। वहां मछलियों और सी फूडस को पैक करने में इसका इस्तेमाल होता हैै। तरुण ने बताया कि अब तक उन्होंने लाखों रुपये की मशीनें लगाईं, लेकिन दफ्तरों के चक्कर लगाने के बाद भी उनको मशीनों पर मिलने वाली सब्सिडी नहीं मिली। अब निवेश मित्र की आनलाइन सिंगल विंडो सिस्टम बनने से ऐसी मुश्किलें आसान होंगी। अलीगढ़ में अगर रक्षा सामग्री का उत्पादन होता है तो निश्चित रूप से ताला और हार्डवेयर के बाद नये रोजगार क्षेत्र का विकास होगा।
इनका होता निर्माण
विस्फोटक जिलेटिन को पैक करने की एल्यूमिनियम क्लिप
डाइनामाइट ब्लास्ट करने वाले डेटोनेटर का लोहे का खोल
खतरनाक विस्फोटकों के मिश्रण को मिलाने वाली बड़ी मशीनें
स्मोक गैस और टियर गैस के कैप्सूल का एल्यूमिनियम खोल
देश की चर्चित बोफोर्स तोप के गोले दगाने वाला स्ट्राइक कैप
धौलपुर और कोटा में बनती है रक्षा सामग्री
राजस्थान के धौलपुर और कोटा में भी कुछ निजी कंपनियां रक्षा क्षेत्र से जुड़ी सामग्री या उनके कलपुर्जे बनाती है। उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ और कानपुर में कुछ कंपनियां ये काम कर रही हैं। महाराष्ट्र और गुजरात में भी ऐसी कुछ कंपनियां हैं।
मिसाइल की इग्निटर एसेंबली बनती है
तालानगरी में अत्याधुनिक मिसाइल की इग्निटर एसेंबली बन रही है, जो मिसाइल को गति देने से पहले उसमें नीचे की ओर एक ब्लास्ट कर ऊर्जा उत्पन्न करती है। इस इग्निटर एसेंबली में आठ छोटे छोटे अत्याधुनिक पुर्जे लगते हैं। इन पुर्जों को मिला कर पूरी एसेंबली बनती है। कुछ वर्ष पहले तक इसकी सप्लाई रूस से भारत आती थी लेकिन अब ये स्वदेश निर्मित है। इसको बनाने वाले ललेश सक्सेना कहते हैं कि वह वर्ष 2011 से कई तकनीकी अनुसंधानों के बाद अब इसका निर्माण कर रहे हैं। पहले उनको तीन हजार पीस का आर्डर मिला था जिसके बाद आठ हजार पीस बने। अब भी काम जारी है। रूस से आने वाले इग्निटर एसेंबली पीस की कीमत 40 हजार थी जबकि वह महज 1500 रुपये में इसको तैयार करते हैं।
अलीगढ़ में रेलवे का सामान भी बन रहा
कुछ साल पहले तक अलीगढ़ में ट्रेन के इंजन में इस्तेमाल होने वाले कुछ पुर्जे बनते थे। लेकिन यहां मूलभूत सुविधाएं नहीं होने से ये काम बंद हो गया। हालांकि वर्तमान यहां रेलगाड़ियों के कोच के बाथरूम में लगने वाली सोप डिस्क और नलों के टैप्स बनते हैं जो कई अलग-अलग कंपनियों के माध्यम से रेलवे तक पहुंचते हैं।