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चारों ओर सन्नाटा, उनींदे सिपाही..अब यही हमारे शहर की रात है भाई

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रात में चहल पहल रहने वाले रेलवे स्टेशन पर लॉकडाउन में पसरा रहा सन्नाटा । - फोटो : CITY OFFICE
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रात भर गुलजार रहने वाले रेलवे स्टेशन और बस स्टैंडों पर सूई पटक सन्नाटा। सड़क पटरियों पर खड़े रिक्शों पर सोते रिक्शा चालक। चौराहों और पुलिस पिकेटों पर उनींदे सिपाही। इसके अलावा अब शहर की सड़कों और शहर में रातभर जीवंत रहने वाले चुनिंदा ठिकानों पर कुछ नहीं दिखाई दे रहा। हां, रात के सन्नाटे को चीरती इक्का-दुक्का रोडवेज बस गुजर जाती हैं लेकिन उसमें से उतरने या चढ़ने वाला भी कोई नहीं होता। कुछ ऐसा नजारा है इन दिनों नाइट लॉकडाउन में शहर का। जिसे देख बस एक ही खयाल जेहन में आता है कि आखिर क्या होकर रह गया है? ये कोरोना और कब तक लोगों के रोजगार पर वज्रपात करेगा? कब तक यह सब चलेगा?
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शनिवार रात टीम अमर उजाला ने शहर के कुछ उन ठिकानों का जायजा लिया, जहां कोरोना काल से पहले तक रात गुलजार रहती थी। हर तरफ शोरगुल, लोगों की आवाजाही और भीड़ से लगता ही नहीं था कि रात है। आलम यह होता था कि अगर लोगों के पास कोई ठिकाना नहीं है तो वहां बैठकर ही रात काट लिया करते थे। कुछ लोगों के रोजगार तो रात में ही इन ठिकानों पर चलते थे। दिन में वे या तो नींद पूरी करते थे या फिर कुछ घंटे सोने के बाद कोई दूसरे काम करते थे। मगर अब ऐसा नहीं है। इनमें सबसे अहम ठिकाना था रेलवे स्टेशन और गांधीपार्क बस स्टैंड।
रेलवे स्टेशन का हाल: सिटी साइड पर रात भर खाने, पीने, चाय-नाश्ता आदि की अनगिनत ढकेलें लगी रहती थीं। ट्रेनों के इंतजार में अनगिनत सवारियां इधर से उधर टहलती, बैठी और लेटी दिखाई दे जाती थीं। टिर्री, रिक्शा और ऑटो वाले चीखते चिल्लाते घूमते रहते थे। मालगोदाम चौराहे पर तैनात रहने वाले पुलिसकर्मी इन वाहन चालकों को इधर से उधर करने के लिए लठियाते रहते थे। अब वहां ऐसा कुछ नहीं था। बिल्कुल सन्नाटा। न बंदा न बंदे की जात।
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कमोबेश यही आलम रेलवे स्टेशन के मुख्य द्वार साइड का था। बाहर रात भर सजने वाले होटल, ढाबे बंद थे। पुलिस की जीप जरूर चंद सिपाहियों को लिए खड़ी थी। जिसमें मौजूद सिपाहियों ने अमर उजाला टीम के कैमरों को देख वहां सोते रिक्शा चालकों को चलता कर दिया। स्टेशन के मुख्य गेट वाले बरामदे में रात भर जमा रहने वाली भीड़ गायब थी। टिकट विंडो बंद थी। स्टेशन प्लेटफार्म पूरी तरह सूना पड़ा था और रात 2 बजे से 4 बजे के बीच ट्रेनों की आवाजाही का कोई शोर भी न सुनाई दिया। हां, स्टेशन के बगल में पान दरीबा रोड पर एक गली में चाय की दुकान जरूर लगी थी। जिसमें से स्टेशन पर नाइड शिफ्ट में रहने वाले लोगों के लिए चाय बन रही थी।
बस स्टैंड का हाल: गांधीपार्क बस स्टैंड पर रात भर रहने वाली भीड़ भाड़ के विषय में कौन नहीं जानता। बस स्टैंड के कौने पर बने केबिन से एक कर्मचारी बसों के आने जाने की सूचना माइक से प्रसारित करता रहता था। चारों ओर चाय व पान आदि की दुकानों पर सवारियां घूमती रहती थीं। तमाम रिक्शे व टैंपो वाले भी घूमते रहते थे। बसों की आवाजाही के बीच सवारियों का आना और जाना लगा रहता था। मगर रात 2 बजे तक वहां तीन-चार सवारियां और आधा दर्जन पहले से खड़ी बसों के सिवाय कुछ न था। सभी होटलों पर ताले थे। चाय की दुकानें बंद थीं। दो सिपाही इधर से उधर सुरक्षा के लिहाज से टहल रहे थे। दिल्ली या आगरा की ओर से एकाध बस आई भी तो उसमें से न कोई उतरा और न चढ़ा। कुछ ऐसे ही हालत सारसौल स्थित बस स्टैंड के थे।
बाकी शहर में भी यही आलम:
इसके अलावा बाकी शहर में भी यही आलम था। रात भर में जगह-जगह पुलिसकर्मी या तो चौराहों पर टहलते मिले या कुर्सियों पर उंघियाते मिले। कुछ चौराहों पर रिक्शा चालक सोते मिले। बाकी पूरे शहर में घूमने पर मात्र एक ज्वालापुरी पुलिस चौकी के बगल की चाय की दुकान जरूर ऐसी मिली, जहां रात भर शहर में गश्त करती घूमती पुलिस क्यूआरटी वैन चाय पीने पहुंची।
अब चार बजे नहीं होती शहर की सुबह
कोरोना काल से पहले माहौल ऐसा था कि चार बजे से लोगों का निकलना शुरू हो जाता था। मगर अब ऐसा नहीं है। 4 बजे के बाद तक भी सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ था। हां, अखबार वितरण के ठिकानों पर जरूर 4 बजे चहल पहल शुरू हो गई थी। इसके सिवाय शहर में कहीं भी कुछ नहीं था।
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