गोंडा ब्लॉक के गांव मजूपुर के निवासी स्वामी रामशरण ने लेखपाल की नौकरी छोड़ दी। टप्पल क्षेत्र के गांव उसरह रसूलपुर आकर पांचवीं तक के बच्चों को पढ़ाने लगे। उनके पढ़ाए तमाम छात्र आज एक से बढ़कर एक बड़े पद पर अधिकारी हैं।
गुरु त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति होते हैं। 93 वर्षीय स्वामी रामशरण भैया ऐसा ही एक उदाहरण हैं। उन्होंने गांव के बच्चों को शिक्षित करने के लिए लेखपाल की नौकरी छोड़ दी। उनके पढ़ाए तमाम छात्र आज डॉक्टर, इंजीनियर और आला अधिकारी हैं।
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स्वामी रामशरण मूलरूप से गोंडा ब्लॉक के गांव मजूपुर के निवासी हैं। उनका जन्म वर्ष 1931 में हुआ था। आजादी के समय क्रांतिकारियों के संपर्क में भी रहे। देश आजाद हुआ तो लेखपाल बन गए, पर नौकरी में मन नहीं लगा। वर्ष 1960 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी। टप्पल क्षेत्र के गांव उसरह रसूलपुर आकर पांचवीं तक के बच्चों को पढ़ाने लगे। इस बीच उन्होंने अपने घर से भी किनारा कर लिया।
इसके कुछ वर्ष बाद 1972 में टप्पल क्षेत्र के ही गांव जलालपुर आ गए। यहां पर उन्होंने एक बरगद का पौधा लगाया और समय गुजरने के साथ ही इसकी छांव में बच्चों को पढ़ाते रहे। आज यह वट वृक्ष 52 वर्ष का हो चुका है। करीब डेढ़ सौ बच्चे रोजाना यहां पढ़ते हैं। उनके खाने पीने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए कुछ बच्चे अपने घर से एक दो-रोटी अधिक लाते हैं। उन्होंने टप्पल क्षेत्र के गांव दमुआका, प्रेमपुर, इतवारपुर आदि गांवों में स्वच्छता की अलख भी जगाई।
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गेल के डायरेक्टर बोले.. बदल दी जिंदगी
स्वामी रामशरण के शिष्य और गेल इंडिया के डायरेक्टर शेर सिंह बताते हैं कि तकरीबन 40 वर्ष पूर्व गुरुजी ने उन्हें भी पांचवीं तक पढ़ाया है। वह बच्चों से बहुत स्नेह करते थे। वह कहते थे कि तुम लोगों के लिए ही हमने घर परिवार और अपनी सरकारी नौकरी तक छोड़ दी। यदि पढ़ाई नहीं करोगे तो मेरी सारी तपस्या बर्बाद हो जाएगी। शेर सिंह कहते हैं कि उन्होंने हजारों बच्चों को पढ़ाया है, जो उच्च पदों पर तैनात हैं।